साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
आओ
आशाओं को
महीन छलनी में
रखकर देखते हैं
और फिर
छलनी को
हौले-हौले
रीतते हुए देखते हैं
बस देखना है
आशाएँ
औंधे मुँह तो नहीं गिरीं
या कोई
सुगबुगाहट तो नहीं हुई।
©रवीन्द्र सिंह यादव
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 15 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं |
आशाएँ कल की उम्मीद जगाती हैं, अब वर्तमान में जीना सीखना है, गिरती हैं तो गिरें आशाएँ, हमें अपनी शक्ति पर भरोसा करना है
आशाएं छन जाएंगी
बहुत सुंदर
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आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 15 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंस्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं |
जवाब देंहटाएंआशाएँ कल की उम्मीद जगाती हैं, अब वर्तमान में जीना सीखना है, गिरती हैं तो गिरें आशाएँ, हमें अपनी शक्ति पर भरोसा करना है
जवाब देंहटाएंआशाएं छन जाएंगी
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
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