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मंगलवार, 2 जून 2026

युद्ध में ध्वस्त हुआ घर

युद्ध में ध्वस्त हुआ घर 

गया है तार-तार बिखर

धधकते अंगारों पर 

आओ बरसो प्यारे जलधर

गृहस्वामी का कुंबा गया

द्वार पर लहलहाता अमलतास झुलस गया 

दीमक,चींटी,चूहा,चिड़िया और कॉकरोच भी  

अब गये हैं सारे के सारे मर

नन्हे सुकोमल हाथों ने 

बनाई थी जो पेंटिंग 

बच्चों के अनमोल रत्न खिलौने 

पढ़ने-लिखने के लिये किताबें-क़लम 

माँ के बनाये हुए स्वेटर

पिता ने सजायी थीं जो ईंटें  

सभी की पसंद सब्ज़ नर्सरी

सहेजे गये भोज्य-पदार्थ और दवाई 

आधुनिकता का साज़-ओ-सामान 

संभावनाओं का विस्तृत विराट वितान 

यादें-रिश्ते-सपने सब धमाके में ख़ाक हुए जलकर  

वह कौन क्रूर विकृत दिमाग़ व्यक्ति है 

नष्ट हुए हैं ये सब जिसके आदेश पर? 

© रवीन्द्र सिंह यादव   

शब्दार्थ:

1. कुंबा (संस्कृत) = परिवार, घराना, क़बीला 

2. सब्ज़ (फ़ारसी) = हरा रंग, रंग में हरी,हरियाली 

3. ख़ाक (फ़ारसी)= मिट्टी 

4.जलधर= बादल, संगीत का एक राग

5. साज़ (फ़ारसी) = संगीत का उपकरण, वाद्ययंत्र   

  

शनिवार, 16 मई 2026

कॉकरोच और परजीवी

जिसके मन-मस्तिष्क में 

देश के सजग-सक्रिय नागरिकों के प्रति 

कुंठा और खिन्नता से लबरेज़ 

घनघोर घृणा भरी हो 

वह हमारे संविधान का 

संरक्षक होने की पात्रता नहीं रखता 

शासन-प्रशासन में 

पारदर्शिता लाने हेतु सक्रिय 

प्रबुद्ध स्वतंत्र कार्यकर्ताओं को 

कॉकरोच और परजीवी कहना 

सर्वथा अस्वीकार्य है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो या 

सूचना का अधिकार 

संविधान ने दिये हैं अधिकार 

जो व्यक्ति विशेष की कृपा पर निर्भर नहीं

समाज की कमाई है व्यक्ति की नहीं!  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

जारी है युद्ध

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मे 

कुबुद्धि बालक  

अब तक तो वयोवृद्ध हो चुके हैं

हिंसक उन्माद में डूबकर

मानसिक संतुलन खो चुके हैं  

अमेरिका और इज़राइल 

मिलकर लड़ रहे हैं युद्ध 

अकेले ईरान से

महीना भर भी कम लग रहा है इन्हें 

लड़ते-लड़ते भीषण युद्ध 

मारे जा रहे हैं मासूम बच्चे 

जिनका कोई अपराध नहीं 

मारे जा रहे हैं लोग 

जिनके पास बचाव के लिये कोई हथियार नहीं 

मारे जा रहे हैं लगातार 

निरपराध परिंदे और सुकोमल तितलियाँ 

जो अनभिज्ञ हैं विकृत मानवीय सोच से 

क्या दोष है पर्यावरण का 

जो डूब गया है 

बिषैले बारूद के गर्द-ओ-ग़ुबार में 

सामूहिक मृत्यु को सहज बनाते 

विवेकहीन नेताओं के आदेश

भरा है जिनमें तकनीकी आवेश  

अपने लिये सुखद मृत्यु की कल्पना में डूबे हैं 

धिक्कार है ऐसे संवेदनाविहीन दिमाग़ों पर!

जागो शांति के मसीहाओ!

वक़्त रहते पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!

और कोई कुबुद्धि ऐसी क्षमता में न हो 

जो ले जाए दुनिया को 

परमाणु-युद्ध की ओर 

विवेकशील मस्तिष्क को ही सौंपना 

अब देश की बाग-डोर!    

 © रवीन्द्र सिंह यादव  


रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव