पेज
▼
पेज (PAGES)
▼
सत्ता का रूप
वीभत्स हो उठता है
जब उसके हो जाते हैं
नुकीले दाँत
पैने-लंबे पंजों के नाख़ुन
आँखों से विलुप्त शील
ह्रदय में बैठ जाती है
स्वार्थी संवेदनहीनता
तब राजधानी की
ख़ाकी सड़कों पर
उसका क्रूर अमानवीय चेहरा
अट्टहास करता हुआ
झूम-झूमकर थिरकता है
मासूमों को कुचलकर
करता है भयाक्रांत
अपने ही
निरपराध नागरिकों को
जो भाता है
चंद चालाक धूर्तों को!
©रवीन्द्र सिंह यादव