रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है अपना रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्राकृतिक रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. परिवर्तन चक्र शाश्वत
    अजनबियत भ्रम है
    प्रकृति का अंश मानव
    आना-जाना नियति क्रम है।
    --------
    बहुत अच्छी रचना।
    सादर।
    ----
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १३ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं

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