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शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

रथ पर विहान के हो सवार












सुबकती रात 

सह रही

कुछ ज़्यादा है 

घनेरा अँधेरा इस बार,

चिरप्रतीक्षित राहत 

आयेगी ज़रूर

रथ पर विहान के हो सवार।



सहमी हैं

शजर पर

सहस्स्रों सुकोमल पत्तियाँ, 

सोचते हैं

मुरझाएँगे

खिलने से पहले

गुँचे, गुल और कलियाँ।



मुँह फेरकर

उदास चाँद ने ओढ़ ली है

कुहाँसे की घनी चादर,

ख़ामोश हैं

बुलबुल, तितली, भँवरे

पूस की रात में झरता

फाहे-सा नाज़ुक हिम-तुषार। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

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