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शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

बसंत तुम आ तो गये हो!
















बसंत तुम आ तो गये हो! 
लेकिन कहाँ है...
तुम्हारी सौम्य सुकुमारता ?
आओ!
देखो!
कैसे कोमल मन है हारता।

खेत, नदी, झरने, बर्फ़ीली पर्वत-मालाओं में 
फ़स्ल-ए-गुल के अनुपम नज़ारे, 
बुलबुल, कोयल, मयूर, टिटहरी 
टीसभरे बोलों से बसंतोत्सव को पुकारे। 

अमराइयों में नवोदित मंजरियों का
बसंती-बयार के साथ मोहक नृत्य,
मानव का सौंदर्यबोध से पलायन 
वर्चस्व-चेष्टा के अनेक आलोच्य-कृत्य। 

अभी गुज़र जाओ चुपचाप 
सन्नाटे में विलीन है पदचाप
बदलती परिभाषाओं की व्याख्या में 
अनवरत तल्लीन हैं बसंत-चितेरे। 
© रवीन्द्र सिंह यादव 
    

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