आओ
आशाओं को
महीन छलनी में
रखकर देखते हैं
और फिर
छलनी को
हौले-हौले
रीतते हुए देखते हैं
बस देखना है
आशाएँ
औंधे मुँह तो नहीं गिरीं
या कोई
सुगबुगाहट तो नहीं हुई।
©रवीन्द्र सिंह यादव
साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
आओ
आशाओं को
महीन छलनी में
रखकर देखते हैं
और फिर
छलनी को
हौले-हौले
रीतते हुए देखते हैं
बस देखना है
आशाएँ
औंधे मुँह तो नहीं गिरीं
या कोई
सुगबुगाहट तो नहीं हुई।
©रवीन्द्र सिंह यादव
आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी
©रवीन्द्र सिंह यादव
आओ आशाओं को महीन छलनी में रखकर देखते हैं और फिर छलनी को हौले-हौले रीतते हुए देखते हैं बस देखना है आशाएँ औंधे मुँह तो नहीं गिरीं या क...