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मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

अवसान की अवधारणाएँ

जटिलताएँ जीवन कीं  

सापेक्ष आलोकित हैं 

अस्तित्त्व-वेदना का 
  
पराभवपरायण होना 

अनंत और विस्तृत है

अखिल व्योम में व्याप्त हैं 

अवसान की अवधारणाएँ 

मधु-मालती तो खिल उठी 

दुर्भावनाएँ आशंकाएँ परे रख 

बेरी पर बचा है बस एक बेर

बीतते बूढ़े बसंत का  

डाली झुका स्वाद चख। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव   

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

नारियल और बेर


नारियल बाहर भूरा

अंदर गोरा पनीला,

बाहर दिखता रुखा

अंदर नरम लचीला।


बाहर सख़्त खुरदरा

भीतर उससे विपरीत,

दिखते देशी, हैं अँग्रेज़

है कैसी जग की रीत।


युग बीत गये बहुतेरे

बदला न मन का फेर,

अंदर कठोर बाहर रसीला

मिलता खट्टा-मीठा बेर।


हैं क़ुदरत के खेल निराले

जीवन का मर्म सरल-सा,

दृष्टिकोण और मंथन में

आ रहा उबाल गरल-सा।

© रवीन्द्र सिंह यादव



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