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बुधवार, 17 जनवरी 2018

चाहा था एक दिन ...

माँगी थीं 
जब बिजलियाँ,  
उमड़कर 
काली घटाएँ आ गयीं। 

देखे क्या जन्नत के 
दिलकश ख़्वाब,
सज-धजकर  
गर्दिश की बारातें आ गयीं।  

चाही हर शय 
हसीं जब  भी, 
बेरहम हो 
आड़े 
वक़्त की चालें आ गयीं। 

इंतज़ार था 
कि आँखों से बात हो, 
तिनकों के साथ 
ज़ालिम हवाऐं आ गयीं। 

दर्द-ए-जिगर से 
राहत माँगी थी एक दिन 
नश्तरों की ज़ख़्म पर 
बौछारें आ गयीं।   

चाहा था एक दिन 
पीना ठंडा पानी ,
लेकर वो तश्तरी-ए-अश्क़ में 
सुनामी लहरें आ गयीं।  

# रवीन्द्र सिंह यादव 

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