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शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

स्त्री और स्वतंत्रता


अनिश्चितता 

असुरक्षा 

अस्थिरता का 

दौर था कभी 

तत्कालीन परिस्थितियोंवश

पूर्वाग्रही मंशा से  

स्त्री को 

जकड़ा गया 

वर्जना की सख़्त बेड़ियों में

वर्जनाओं की मज़बूत कड़ियों में  

सामाजिक नियमावली के 

सुनहरे कड़े जाल में 

स्वतंत्रता से 

रहे परे 

हर हाल में 

आज स्थिरता का 

अनुकूल दौर है 

क़ानून हैं 

सहूलियतें हैं 

अवसर हैं

भौतिकता का अंबार है

अपराध का बाज़ार है 

परिभाषित रिश्ते हैं

गौरव है

 गरिमा है  

पद है 

किंतु  

आज भी 

उसकी एक हद है 

थमा दिया गया उसे 

अदृश्य घोषणा-पत्र

जिसमें 

"डूज़ एन्ड डोंट" 

सीमाओं की लकीरें 

हाईलाइट हो जाती हैं 

फ्लोरोसेंट लाइट में 

चमकती रहती हैं

सतत एहसास दिलाने के लिए  

कि स्वतंत्रता दूर की कौड़ी है!
                       
    © रवीन्द्र सिंह यादव

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