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सोमवार, 24 दिसंबर 2018

श्रद्धाँजलि

श्रद्धाँजलि !

जला दी गयी अंजलि !

ताँडव करती 

ख़ौफ़नाक बर्बरता 

चीख़ती-चिल्लाती 

कराहती मानवता 

ज्वाला में 

धधका होगा शरीर 

सही गयी होगी 

कैसे तपन-पीर

बेख़ौफ़ दरिंदे 

क्या संदेश देना चाहते हैं ?

स्त्री को कौन-सा 

सबक़ सिखाना चाहते हैं?

न्याय के लिये 

भटकते लाचारों को देख 

करते हैं अपराधी अट्टहास 

लचर व्यवस्था देख-देख!    

© रवीन्द्र सिंह यादव

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