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रविवार, 14 जुलाई 2024

छल

ईवीएम के समाचार पढ़कर 

मुझे स्मरण हो आते हैं शकुनि के प्रबल पासे

वे सत्ता-संपत्ति  के नहीं बल्कि थे रक्त के प्यासे

द्रौपदी द्वारा दुर्योधन का उपहास 

बन गई गले की चुभनभरी फाँस   

शक्ति,साधन,मर्यादा,दर्प और ऐश्वर्य 

शकुनि के पासों के आगे नत-मस्तक

छल बल है निरपराध के लिए घातक  

नियम पालन की नैतिकता से बँधे रहे महारथी चुपचाप  

स्त्री-गरिमा होती तार-तार देखते रहे शीश झुकाए क्रूरता का वीभत्स नाच

इतिहास का असहज सत्य 

तबाही के उपरांत आ खड़ा होता है 

कहता है-

छल आश्रय लेता है 

सहसा अनैतिकता के भंडार में! 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 16 जून 2024

तपिश और पेड़

चित्र: महेन्द्र सिंह 


 गमलों में पेड़ लगाकर 

आत्ममुग्ध होता समाज 

व्यथित है 

सूरज की प्रचंड तपिश से

हाँ, बदलेगा वातावरण 

बड़ी होती इस कोशिश से 


पेड़ की जड़ 

खींचती जल भूतल से 

पहुँचाती आँतरिक वाहिनियों के ज़रिये 

पत्ती के स्टोमेटा तक 

वाष्पोत्सर्जन वातावरण को देता ठंडक

छाया में आती राहत की ठसक

 

जो सूख गया या काटा गया पेड़ 

तो देखा गया जलते हुए 

सर्दी के अलाव में 

या घर की शोभा बनते हुए 


पेड़ तो स्वयं उगते हैं 

सजते-सँवरते हैं वन-उपवन होकर 

कुदृष्टि आदमी की उजाड़ती है वृक्ष 

अति भौतिकता का दास होकर

उजड़ते वन बसती बस्तियाँ 

बढ़ता वातावरण का तापमान 

जीवन के लिए ख़तरा


वृक्षों को जबरन मुक्ति देता आदमी 

कभी झाँक लेगा अपने भीतर 

रोते-सिसकते मिलेंगे 

चिड़िया,कोयल,मोर,बटेर,तीतर। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव

  


बुधवार, 29 मई 2024

नदी का स्वभाव

चित्र: महेन्द्र सिंह 

कल-कल करती 

निर्मल नदी को देखो

गतिमान है मुहाने की ओर 

सूरज की तपिश 

संलग्न है 

नदी की काया को 

छरहरा बनाने की ओर 

नदी आशांवित होती है 

पहुँचने मुहाने तक 

सागर में मिलने हेतु  

आगे मिल जाएँगीं 

समा जाएँगीं 

कुछ और छोटी-छोटी नदियाँ

उसकी जलराशि और सौंदर्य में इज़ाफ़ा करने  

नदी उनका 

तिरस्कार नहीं करती है 

आह्लादित होती है 

संगम और समंवय के साथ

मनुष्य,पशु-पक्षियों,पेड़-पौधों का 

सुकून में बदलता है 

प्यास का एहसास

देखकर बहती निर्मल नदी

लगे अंकुश मानवीय महत्वाकांक्षाओं  पर 

तो बहती रहे नदी 

अविरल,अविचल,अविकल,अनवरत 

सदी-दर-सदी कल-कल छल-छल।   

©रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

भीड़

पढ़ा होगा आपने कभी 

नीड़ का निर्माण 

अब पढ़ते रहिए 

भीड़ का निर्माण 

मनोवैज्ञानिक

समाजशास्त्री 

करते रहे शोध 

भीड़ के चरित्र पर 

राजनीति ने लाद दी 

अपनी मनोकामनाएँ भीड़ पर

अंतर में छाए अँधेरों में 

उभरते हैं बिंब लिए उन्मादी उमंगें  

साझा सहमति से उभरती हैं 

विनाश की तीखी तीव्र तरंगें

या किसी और के द्वारा तय 

लक्ष्य की ओर 

मुड़ जाती है भीड़...

क्योंकि 

भीड़ का कोई धर्म नहीं होता 

बुध्दि, विवेक, मर्म नहीं होता।      

©रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

मदद के लिए गुहार आठ किलोमीटर!

चीख़ती चलती चली गई 

वह किशोरी 

माँगती हुई मदद दर-दर दर्द से कराहती 

पैदल भागती आठ किलोमीटर

उज्जैन का वह पथ 

थी ख़ून से लथपथ 

वह बलात्कार पीड़िता

हाय! फुक गया है 

समाज की संवेदना का मीटर 

एक नेक युवा पुजारी ने 

अनेक किंतु-परंतुओं को 

विराम देते हुए 

पीड़िता की मदद की

खींची लकीर इंसानियत की 

गुफाओं से निकलकर 

भव्य अट्टालिकाओं में आ बसा

आधुनिक स्वार्थी समाज 

संवेदना को मारकर

आज कितना सभ्य हुआ है?

सामाजिक मूल्यों का कैनवास

कितना भव्य हुआ है?

अफ़सोस!

हमारी गुफा में अंधकार

अब और गहरा गया है

हमारे अंतस में घृणा को

किरायेदार बनाकर कोई ठहरा गया है!

©रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 14 मई 2023

देवता पत्थर होकर मूक हो गया

चित्र: महेन्द्र सिंह 

जिसे पूजा 

तब वह पत्थर था न था 

पता न था  

अगाध श्रद्धा ने 

गाढ़ दिए 

सफ़र में मील के पत्थर

दीवानगी की हद तक पूजा उसे 

एक दिन फ़ैसले की घड़ी आई 

जब उसके पुजारी ने 

अत्याचार की हदें पार कर दीं 

माँगा इंसाफ़ 

तो देवता 

पत्थर होकर 

मूक हो गया

इंसाफ़ का सवाल 

खाक़ हो गया

याचक ने ख़ुद को 

पत्थरों से घिरा पाया। 

© रवीन्द्र सिंह यादव   
      

रविवार, 25 सितंबर 2022

समय के साथ

युगों-युगों में 

समय के साथ 

समाज सभ्य हुआ 

सुसंस्कृत होने की प्रवृत्ति का 

सतत क्षय हुआ

आज अवांछित अभिलाषाओं का 

अनमना आलोक 

अभिशप्त यंत्रणा के 

अंधड़ में ढल गया है 

भव्यता,भौतिकता के 

विस्तार का बीज 

लालच के गर्भ में पल रहा है  

विवेकहीन मस्तिष्क 

भावविहीन ह्रदय

क्षत-विक्षत भावनाओं का 

अंबार लादे 

बैल-सा जुते रहने की 

मंत्रणा कर 

सो गए हैं

आस्तीन का सॉंप डसेगा  

तंद्रा टूटेगी

तब तक  

समय रेत-सा फिसलकर

भावी पीढ़ियों की 

आँखों की किरकिरी बन चुका होगा!

© रवीन्द्र सिंह यादव  


बुधवार, 14 सितंबर 2022

मिसरी की डली के लिए

आईना दिखाने वाले 

कहाँ ग़ाएब हो गए?

शायद वे 

घृणा का गान सुनते-सुनते 

लहू का घूँट पीते-पीते 

जान की फ़िक्र में पड़ गए...

ऐब तो दूसरे ही बता सकते हैं

इस कथन के भी पाँव उखड़ गए... 

हरा-भरा है देश हमारा 

फिर मिसरी की डली के लिए 

एक मासूम की आँखों में 

गहरी उदासी क्यों है?

कहते हो 

क़ानून का राज है देश में 

तो फिर 

हत्यारों, बलात्कारियों;दंगाइयों को 

मिल रही शाबाशी क्यों है? 

तुम आईना तोड़ भी दो

अपने इंतज़ामों से 

हम कदापि न घबराएँगे  

वक़्त गर्दन पकड़कर 

झुकाएगा एक दिन  

तुम्हारा वीभत्स चेहरा 

मक्कारियाँ उसकीं 

चुल्लूभर पानी में हम दिखाएँगे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव   


बुधवार, 25 मई 2022

समय का वज्र

 व्यथा का तम 

और कितना 

सघन होगा? 

अँधेरे-उजाले के मध्य 

प्रतीक्षा के पर्वत के छोर पर 

कब प्रभात के तारे का 

सुखद आगमन होगा?  

लोक-मानस में 

अधीरता के आयाम 

इतिहास की उर्वरा माटी पर 

संप्रति 

कोई  तो

सर्जना के संवर्धन की 

तबीयत समझ    

लिखता जा रहा है

बहारों की आहट

अभी दूर है 

वक़्त को यही मंज़ूर है

इस कठोरता को 

रेखांकित कर दिया गया है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव




  


शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

ओखली और मूसल

 

जानते हो?

ओखली और मूसल 

गाँव में घर-घर हुआ करते थे

वह रिदम 

आज भी 

गूँजती रहती है 

मेरे भीतर 

एक ही ओखली में 

अम्मा-चाची 

अपने-अपने 

मूसल से धान कूटती थीं 

साथ-साथ...  

एक मूसल नीचे आता 

तो दूसरा ऊपर जाता

कोई आपस में न टकराता  

बीच-बीच में 

ओखली में 

हाथ का सरपट करतब 

अनकुटे धान को 

मूसल की चोटों के केन्द्र में लाता 

मूसल-प्रहार से 

उत्पन्न ध्वनि 

कर्कश नहीं 

संगीतमय हो जाती

मूसल की धमक 

चूड़ियों की खनक

सुरीला राग बन 

परिवेश में एकाकार हो जाती  

देखते-देखते 

धान की रूह फ़ना हो जाती

चावल अलग 

और भूसी विलग हो जाती  

चावल के दाने  

चिड़िया के बच्चों के गले उतरना  

आसान हो जाते

पंसेरी-दो-पंसेरी धान कूटकर 

मूसल शांत हो जाते

सुकोमल कोंपलों को 

छूकर आती बसंती बयार 

स्नेह का स्पर्श लिए 

डोलती आ जाती घर-द्वार 

तब... 

मूसल चलानेवाले पसीने में भीगे हाथ 

निर्विकल्प पावन हो जाते 

जब भूख और स्वाद 

घुल-मिल तृप्ति हो जाते     

कमाल का सामंजस्य था

तारतम्य और अभ्यास था

भावनाओं की उर्वरा खाद

बढ़ाती जीवट का स्वाद  

हल्की हठीली 

हँसी-ठिठोली 

हास-परिहास था 

बड़ी गृहस्थी 

और संयुक्त परिवार के 

ताने-बाने को 

बिना टकराहट 

संजोए रखने का 

विराट भाव सहअस्तित्व का 

परिवार से ग़ाएब क्या हुआ 

तो दुनिया भी 

उसे अनुभव करना 

भूल गई

अपने-पराये के भेद में 

निपुण हो गई

ख़ाली बासनों-सी 

बजने लग गई!   

© रवीन्द्र सिंह यादव   


शब्दार्थ 

पंसेरी = पाँच सेर वज़्न (एक सेर = 933 ग्राम ) 

विलग = पृथक, अलग, जोड़ा फूटना, साथ छूटना, विभक्त,असंबद्ध    

  

सोमवार, 24 जनवरी 2022

रिक्शेवाले

रिक्शेवालों को 

आलीशान बाज़ारों से 

दूर 

कर दिया गया है

झीने वस्त्र को 

लौह-तार से सिया गया है 

बहाना 

बड़ा ख़ूबसूरत है

वे 

पैदल चलनेवालों का भी 

स्थान 

घेर लेते हैं

सच तो यह है 

कि 

वे 

अवरोधों से आक्रांत ग़रीब 

मख़मल में टाट का पैबंद नज़र आते हैं

मशीनें 

मानवश्रम का 

मान घटाती ही चली जा रही हैं 

रोज़गार के अवसरों पर 

कुटिल कैंचियाँ  

चलती ही चली जा रही हैं 

भव्यता का 

क़ाइल हुआ समाज 

वैचारिक दरिद्रता ओढ़ रहा है 

संवेदना को 

परे रख 

ख़ुद को 

रोबॉटिक जीवन की ओर मोड़ रहा है।  

© रवीन्द्र सिंह यादव       



शनिवार, 1 जनवरी 2022

अमन का गीत मेरा खो गया है...

अमन का गीत 

मेरा खो गया है

देश का युवा चेहरा

पर कटे पंछी-सा  

गर्दिश में खो गया है

वो फ़ाख़्ता 

जो गुलिस्तां में 

ग़म-ख़ोर गीत गाती है 

उसका गला 

अब तो रुँध-रुँधकर 

थर्राकर भर्रा गया है

वो चित्रकार 

रंग, कूची; कल्पना के साथ 

बस बेबस खड़ा है 

हालात के नारों को 

सुन-सुनकर घबरा गया है

वाणी पर नियंत्रण 

क़लम पर पाबंदी 

मतभिन्नता की आज़ादी

अभिव्यक्ति के आयाम

सत्ता से तीखे सवाल पर 

लेखक का वजूद चरमरा गया

गाँधी की हत्या से 

सब्र नहीं जिन्हें 

वे अब रोज़-रोज़ 

चरित्रहत्या कर रहे हैं

यह कौन है 

जो शांत माहौल में

उकसावे का परचम लहरा गया?

© रवीन्द्र सिंह यादव       


मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

साधन-संपन्न और साधनहीन

एक पौधा 

रोपा गया 

सबने दिया 

खाद-पानी

सुरक्षा देने की 

सबने ठानी 

पोषित पौधा पल्लवित पुष्पित हुआ

विशाल वृक्ष में तब्दील हुआ 

फलदार हुआ 

फलों को पाने की आशा में 

साधनहीन 

नीचे खड़े-खड़े 

रसीले फलों को 

निहारते रहे 

हवाई पहुँचवाले 

क्रेन आदि लाए

साथ सुरक्षा भी लाए  

सारे फल तोड़ ले गए

साधनविहीन शोर मचाते रह गए।   

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 10 जुलाई 2021

सूखती नदी और बादल की चिंता

 



सूखती नदी 

         नदियों पर बनते बाँध आधुनिकता से परिपूर्ण मानव जीवन के लिए ऊर्जा की तमाम ज़रूरतें पूरी करते हैं वहीं बाँधों से निकलीं नहरें विस्तृत क्षेत्र में कृषि हेतु सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करातीं हैं। एक नदी बाँध से आगे के अपने मार्ग पर बहते-बहते सिकुड़ते किनारों को लेकर व्यथित है। बादल नदी के ऊपर मड़राते हैं तब नदी की पीड़ा कुछ यों उभरती है-  

सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!

जल-दर्पण में मुखड़ा फिर देखो एक बार।

सिमट रहे तटबंध 

उदास है नाविक,

बरसो आकर 

ऋतु-चक्र स्वाभाविक,

बँधी है नाव 

रेत पड़ी पतवार!

सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!


क़द मेरा लघुतम हुआ जाता है,

मुझे अस्तित्त्व का संकट सताता है,

पंछी उड़े जा पहुँचे किसी और पड़ाव,

लहराती लू आती करती जल में ठहराव,

नभ से धरती पर आ जाओ 

सूने खेतों में पड़ गई गहरी दरार!

सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!


भँवर स्मृतियों का 

मेरे भीतर पागल हो रहा है,

संगीत सृष्टि का 

जाग जाएगा 

बसंत के बाद सो रहा है,

मगरमच्छ घड़ियाल भी 

एक दिन साथ छोड़कर चल देंगे,

मेरे अब तक पालन-पोषण का 

निष्ठुर बेस्वाद कसैला फल देंगे,

चीज़ें तो नीचे ही गिरतीं हैं 

बरसो! जुड़े रहें सहअस्तित्त्व के तार!

सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!


बादल की चिंता

बादल ने नदी की पीड़ा को शिद्दत से समझा और दूरदृष्टा के किरदार में आकर कुछ यों कहा-

सुन! ओ भोली नदी!

यह तो दुखों की सदी!

मैं पतझड़ के पत्ते-सा न गिरता हूँ,

यायावर-सा ठेठ सच लिए फिरता हूँ,

सत्ता सन्नाटे का जाल 

चुपचाप बुन रही है,

उन्माद के अंधड़ में 

मानवता सर धुन रही है 

सुनो नदी!

तुम्हारा प्रवाह 

अनवरत रह सकता है,

तुम्हारा निर्मल नीर 

कल-कल बह सकता है 

आदमी से पूछो...

क्या वह 

तुम्हारे बिन रह सकता है?

तुम्हारे तटबंध 

सुषमित सौंदर्यवान हरे-भरे हो सकते हैं,

किनारे कर्णप्रिय कलरव से भरे हो सकते हैं,

आदमी से कहो! 

बस, तूने हद पार कर दी!

सुन! ओ भोली नदी!


मैं बरसूँ 

तुम्हारे रूप-लावण्य के लिए!

या सहेजूँ अपना नीर 

परम ध्येय धन्य के लिए!

क्या पता किस दिन 

किसी सत्ताधीश का विवेक मर जाए!

उसकी चपल चंचला उँगली से 

परमाणु-बटन दब जाए!

परमाणु बम की असीमित ऊर्जा से 

जल सकते हैं ज़मीं-आसमां,

उस दिन तुम्हें ही पुकारेंगे पीड़ा से भरे लोग 

हाय! नदी माँ, हाय! नदी माँ!

मुझे तो बरसना ही है, 

मत कहो बेदर्दी!

सुन! ओ भोली नदी!

© रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 20 जून 2021

पिता की स्मृति

 

6 फरवरी 2008 से 

अब तक 

एक अधूरापन 

मेरे भीतर 

घर कर गया है 

करते होंगे लोग 

बरसी पर स्मरण पिता को

मेरी स्मृति से 

वह पल जाता ही नहीं 

जब मुखाग्नि दी थी 

बड़े भैया ने चिता को

एक काया 

अपना सफ़र 

मुकम्मल कर रही थी   

देखते-देखते 

पिता जी की पार्थिव-देह 

पंचतत्त्व में विलीन हो गई थी

उन्हें लेकर गए थे 

सजी हुई उदास अर्थी पर  

शमशान-घाट

लौट आए थे 

उनकी स्मृतियों के साथ

बेबस बस ख़ाली हाथ

संस्कारों की फ़सल 

मूल्यों की अक्षय पूँजी

कुल के दायित्त्व

विश्वास का घनत्त्व  

इच्छाओं की गठरी 

बोध-कथाओं की लायब्रेरी

जीने की कलाओं का विस्तार 

देकर छोड़ गए हो संसार!  

आपकी स्मृति 

सघन परछाइयों में 

शून्य लिख जाती है

जिसके अर्थ तलाशता हुआ 

अपने पिता होने के 

अर्थ तलाशता हूँ

तस्वीर हो जाने के ख़याल में  

ख़ुद को खँगालता हूँ

नब्बे वर्ष की आयु 

निरोग जीवन जीकर

आपका महाप्रस्थान 

आपका साथी बूढ़ा नीम 

है अब मेरा मित्र महान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव


सोमवार, 24 मई 2021

गंगा में बहतीं लाशें

लाशों की दुर्दशा के 

अनचाहे मंज़र 

मुझे सोने नहीं देते 

ये लाशें मुझसे पूछतीं हैं 

गुलाबी रातों के हसीं ख़्वाब में 

कब तक सोए रहोगे?

भारत की साख़ पर 

दुनिया को क्या जवाब दोगे?

अभावों में स्वभाव 

ऐसे बदले कि

चिता का सामान न जुटा सके  

अंतिम संस्कार से 

वंचित हुए पार्थिव शरीर

कुछ बहा दिए गंगा में 

कुछ रेत में दबा दिए... 

माँसाहारी पशु-पक्षी 

लाशों को नौंचते दिखे 

वीडियो बनानेवाले 

वीभत्स कृत्य देखते रहे 

आँधी-तूफ़ान भी आकर 

उड़ाकर रही-सही सूखी रेत

रह-रहकर शव उघाड़ते रहे

करोना महामारी की

दूसरी लहर ने 

ढाया ऐसा क़हर 

छाया है मातम ही मातम 

गाँव-शहर!   

© रवीन्द्र सिंह यादव  

  

गुरुवार, 6 मई 2021

दूर... दूर... 6 फ़ीट दूर!

 

दूर... दूर... 

6 फ़ीट दूर!

करोना ने फैलाया है 

क़दम-दर-क़दम 

फ़ितूर ही फ़ितूर 

वक़्त के क़हर में

हम हुए कितने मजबूर

हँसमुख बच्चे भी 

हुए गुमसुम 

बुज़ुर्गों की ख़ैरियत 

हुई कम-से-कम 

ऑक्सीजन देनेवालों का 

बढ़ा है गुरूर!

करोना के आगे 

खड़ा हूँ सेवा में हुज़ूर!  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

रविवार, 21 मार्च 2021

आम की गुठली का मासूम प्रश्न


1. 

पथिक ने एक गुठली ठुकराई,

लू के मौसम में बहती पुरवाई। 

   

गुठली उछली खेत की मेंड़ पर आई,

ठोकर खाकर आपे से बाहर आई,

रे पथिक! 

जड़ नहीं चेतन हूँ- कहकर चिल्लाई,

सृजन का बीज हूँ 

मुझमें सोई समर्थ अमराई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई। 

2. 

सुनो, ख़ुदग़रज़ आदमी!

क्या भरी है मुझमें ख़ामी?

फेंकी जाती हूँ 

अक्सर घोर उपेक्षा से,

ढूँढ़ा करता है 

कोई मीत मुझे सदेच्छा से,

कभी जा गिरी पथरीली सतह पर,

दब जाती हूँ प्लास्टिक की तह पर,

मिलें अनुकूल मौसम में 

हवा मिट्टी पानी धूप,

अंकुरित हो निखरे 

किसलय संग मेरा नन्हा रूप,

परवश हूँ 

न जानूँ मानव-सी चतुराई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

 3. 

कहा पथिक ने 

आत्मग्लानिवश होकर,

क्षमा करो! 

अनजाने में मारी है ठोकर,

सृष्टि की महिमा में 

उसका उर द्रवित हुआ,

अंतरमन को 

गुठली की गहन वेदना ने छुआ,

कहो! कहानी 

शेष रही जो ए गुठली!

मेरे भीतर अब तो  

उत्कट उत्कंठा अकुलाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई। 

4. 

सुनो! बाग़ में खड़ा है 

एक बूढ़ा मीठा आम, 

मेरा जनक होने पर 

है उसको अभिमान,            

अमराई में गीत सुने हैं 

कोमल कोकिला के, 

छाया में बैठे देखे 

पीर से पीड़ित पथिक महान,

बसंत में मंजरियों पर छाया यौवन, 

अमियाँ झुलाने बहती पुरवाई पवन,

खेल-खेल में बढ़ते-बढ़ते,

तेज़ घाम में बढ़ते-बढ़ते, 

कच्ची अमियाँ रसीला आम हो गई, 

मैं भी अंदर ही अंदर कठोर हो गई,

आम-कैरी मंडी हाट-बाज़ार पहुँचकर 

पेटों में पच गए,

कदाचित दो आम 

आदमी की लालची दृष्टि से 

वृक्ष पर बच गए,

एक दिन आए 

कुछ बच्चे नादान बाग़ में,

झुलस रहे थे 

जून की झुलसाती आग में,

मेरे साथी पर पड़ी थी 

उत्सुक दृष्टि उनकी,

कदाचित थी 

आम तोड़ने की योजना उनकी,

पत्थर-डंडे फेंक-फेंककर 

साथी उनके हाथ लगा,

मेरा मन विचलित होने से 

अब रुक न सका,

टुकड़े-टुकड़े मीठा आम खाया,

कोई ख़याल उनके मन आया,

गुठली को तोड़ा पत्थर से,

अंदर थी मिगी बड़ी सलोनी-सी,

थी सूरत अब उसकी रोनी-सी, 

एक बच्चे ने दबाई मिगी 

तर्जनी और अँगूठे से, 

सब मिलकर बोले- 

उछाल! उछाल!!

तेरी शादी आएगी उसी दिशा से,

उछलकर जाएगी गुठली 

जिस दिशा में फिसलकर बंधन से, 

जाते-जाते 

वे मिगी के टुकड़े-टुकड़े कर गए,

कुछ राह में फेंके उन्होंने 

कुछ चटपट चट कर गए,

खेल-खेल में वे नादान 

एक वृक्ष की संभावना ख़त्म कर गए,

कहते-कहते आत्मकथा 

रुआसी आवाज़ हुई भर्राई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।  

5. 

पथिक बोला-

तुम्हारे साथ क्या घटित हुआ?

तब गुठली की बातों से 

रहस्य उद्घाटित हुआ। 

होता क्या रे! 

मैं भी एक दिन 

एक चरवाहे की नज़र चढ़ गई,

बहुत दिनों छिपी रही पत्तों में 

उस दिन उघड़ गई,

गिरा न पाए थे 

आँधी तोते और गिलहरियाँ,

मेरा पालक 

रोज़-रोज़ लेता रहा बलैयाँ, 

आम हुआ था 

पककर पूरा पीला रसीला,

चरवाहा ही जाने 

ज़बान के चटख़ारे की लीला,

नियति-चक्र की समझो 

जानी-अनजानी भरपाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

6. 

हे गुठली! मैं शर्मिंदा हूँ! 

सृष्टि की गोद में ज़िंदा हूँ!

ऐसी क्रूर अशिष्टता 

अब न होगी मुझसे,

क्या तुम 

दोस्ती कर सकोगी मुझसे?

सुनकर प्रश्न पथिक का 

गुठली ने ली अंगड़ाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

7. 

सुनो पथिक! शेष अभी है कहानी,

मेरे जनक की कथा तुम्हें है सुनानी। 

कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती है,

मैं जिसकी संतान हूँ 

उसकी कथा 

मुझमें स्वाभिमान का बीज बोती है,

वह तब गुठली होने पर 

इतराई, इठलाई थी, 

जब अमीर घर से 

मीठे आम की गुठली 

ग़रीब किसान के हाथ आई थी,

गमले में हुआ सहज अंकुरण 

बाग़ में हुई कुशल हाथों से रोपाई थी,

पशुओं से बचा-बचाकर बड़ा किया 

पेड़ बनने तक खाद-पानी दिया

क्या ऐसा आदमी क़ुदरत ने 

अब पैदा करना बंद कर दिया...?

गुठली का गंभीर मासूम प्रश्न सुन 

पथिक तो हुआ निरुत्तर, 

सोचा, बनना होगा जग में 

इंसान को और भी बेहतर!

गुठली की बात सुनो रे! 

नहीं तो इत कुआँ उत खाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

© रवीन्द्र सिंह यादव     







गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

बालू पर लिखा था एक नाम

सिंधु तट पर 

एक सिंदूरी शाम 

गुज़र रही थी

थी बड़ी सुहावनी  

लगता था 

भानु डूब जाएगा 

अकूत जलराशि में 

चलते-चलते 

बालू पर पसरने का 

मन हुआ 

भुरभुरी बालू पर 

दाहिने हाथ की 

तर्जनी से 

एक नाम लिखा 

सिंधु की दहाडतीं 

प्रचंड लहरें 

अपनी ओर आते देख 

तत्परता से लौट आया 

अगली भोर फिर गया 

सुखद अचरज से देखा 

एक घोंघा 

वही नाम 

बालू पर लिख रहा था... 

© रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

किसको क्या मिला?


 तुच्छताओं को 

स्थाई स्थान ढूँढ़ना था 

तो राजनीति में समा गईं

हताशाओं को 

तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की 

तो कापुरुष में समा गईं

चतुराई चपला-सी चंचल 

भविष्य बनाने निकली 

तो बाज़ारों की रौनक में बस गई 

जीने की चाह 

भटकती रही 

सन्नाटोंभरे खंडहरों में 

लड़खड़ाकर गिरने से पहले 

सँभल गई

मानवता पूँजी के अत्याचार झेलते-झेलते 

क्षत-विक्षत होकर ख़ुद से आश्वस्त हुई 

तो विचार-क्रांति के साथ कोहरे को चीरती चली गई।

© रवीन्द्र सिंह यादव


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