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शनिवार, 2 मई 2020

अपने चेहरे पर मुखौटा क्यों भला?

रेल-पटरी के ऊपर 

वर्षों पहले बने 

जर्जर ज़ंग लगे लोहे के पुल से 

गुज़रते हुए

चिंतनीय सवाल 

मुनिया ने बापू से पूछा-

"एक दिन 

यह पुल गिर जाएगा 

न जाने 

दिन का होगा कौनसा पहर 

चुपचाप अकेला गिरेगा 

या बरपाएगा 

गुज़रते लोगों पर क़हर?

फिर किसी की लापरवाही 

तय करने के लिए 

आयोग बनेगा

दोष तय करने का 

कब योग बनेगा?" 

बापू ने कहा-

"ख़ाली दिमाग़ शैतान की दुकान!

यह नहीं कोई विचार महान

कुछ और सोचो

तुम्हें बड़ा आदमी बनना है।"

"बड़ा आदमी नहीं!

संपूर्ण औरत!

अपने चेहरे पर 

मुखौटा क्यों भला?"

मुनिया चिहुँक पड़ी

मुनिया की समझदारी पर 

बापू की आँखें फटीं रह गयीं। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

#MeeToo मी टू सैलाब ( वर्ण पिरामिड )


ये

मी टू

ले आया

रज़ामंदी

दोगलापन

बीमार ज़ेहन

मंज़र-ए-आम पे !



वो

मर्द

मासूम

कैसे होगा

छीनता  हक़

कुचलता रूह

दफ़्नकर ज़मीर !



क्यों

इश्क़

रोमांस

बदनाम

मी टू सैलाब

लाया है लगाम

ज़बरदस्ती को "न"





मानो

सामान

औरत को

रूह से रूह

करो महसूस

है ज़ाती दिलचस्पी।



है

चढ़ी

सभ्यता

दो सीढ़ियाँ

दिल हैं ख़ाली

तिजोरियाँ भरीं

भौतिकता है हावी।



हो

तुम

बौड़म

मानते हो

होठों पर न

स्त्री के दिल में हाँ

बे-बुनियाद    सोच।

© रवीन्द्र सिंह यादव

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