नासूर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नासूर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 4 जून 2023

कविता! तुम्हें जीना ही होगा

कविता!

तुम्हें फिर ज़िंदा होना होगा 

घृणा का सागर पीने हेतु 

प्रेम और वैमनस्य के बीच 

बनना होगा पुनि-पुनि सेतु 

पथराई संवेदना पर 

बिछानी होगी 

मख़मली मिट्टी की चादर 

ओक लगाकर 

पीना होगा 

महासागर-सा अप्रिय अनादर

रोपने होंगे बीज सद्भाव के 

सहेजने होंगे 

किसलय-कलियाँ,कुसुम-पल्लव  

मिटाने होंगे दाग़ नासूर-घाव के 

कविता!

तुम्हें जीना ही होगा 

मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए 

प्रबुद्ध मानवता की संरचना के लिए!

© रवीन्द्र सिंह यादव   

        

रविवार, 24 अप्रैल 2022

नासूर

वो जो आप 
दूसरों की 
तबाही
देख  
आहें-चीख़ें
बेबस चीत्कार  
सुन 
मन ही मन 
ख़ुश हो रहे हो 
सदियों पुरानी
कुंठा का
नासूर 
सहला रहे हो!
लानत है 
आपके
सभ्य होने पर 
सामाजिक मूल्य
खोकर जीने पर!

© रवीन्द्र सिंह यादव       



विशिष्ट पोस्ट

बहुत बीमार था वह दिन ...

वह बीमार दिन  तड़प-तड़पकर गुज़रा  नई दिल्ली में  एक पचपन साल पुरानी  बहुमंज़िला इमारत  भरभराकर ढह गयी सपने सजाने  भविष्य सँवारने  किरायेदार बन र...