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शनिवार, 3 अप्रैल 2021

न राहत की सुबह न चैन की दुपहरी है



बसंत को विदा हुए

कुछ अरसा ही बीता है 

कुछ पत्ते झड़ गए 

कुछ को नए रंगों में

खिलने का सुभीता है

बकाइन, पीपल, सेमल को देखो 

पुराने पत्तों के झरने के उपरांत 

कैसे सुनहले-हरे पल्लवों से 

लजाते हुए ख़ुद को ढक रहे हैं  

सुदूर अमराइयों में 

कोकिला की कूक है 

पकती फ़सल देख 

किसान को एमएसपी की हूक है

ख़ून-पसीने की कमाई 

कितनी अनिश्चित है 

किसान की समृद्धि 

किसी और के हाथ में सुरक्षित है 

आसमान में उमड़ते बादल 

दूर-दूर तक उठते धूल के ग़ुबार 

बेमौसमी बेचैनी के विस्तार 

नितांत ठूँठ को भी नहीं सुहाते 

विपरीतताओं से हम कब अघाते 

अन्न के दाने 

खेत से घर 

घर से बाज़ार-दर-बाज़ार 

लिए डोलता है कृषक 

इस सफ़र में 

घात लगाए बैठे लुटेरों से 

दिन-रात जूझता है कृषक 

पतझड़ के बाद 

फिर उगाएगा नए पौधे 

रोपेगा उम्मीद के नए पौधे

यह नियति-चक्र में 

शोषण-चक्रव्यूह की 

साँठगाँठ गहरी है

न राहत की सुबह 

न चैन की दुपहरी है। 

 © रवीन्द्र सिंह यादव 

 




मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

तुम्हें पत्थर होने में कितने वर्ष लगे?


पृथ्वी की उथल-पुथल 

उलट-पलट

कंपन-अँगड़ाई  

परिवर्तन की चेष्टा 

कुछ बिखेरा 

कुछ समेटा

भूकंप 

ज्वालामुखी 

बाढ़ 

वज्रपात 

सब झेलती है 

सहनशीलता से 

धधकती धरती

जीवन मूल्यों की 

फफकती फ़सल 

देख रहा है 

आकाश मरती  

पत्थर का कोयला  

बनने में 

पेड़ों को 

करोड़ों वर्ष लगे

ओस को देखो

गेंहूँ की हरी पत्तियों पर  

सुबह-सुबह सत्य-सी 

धूप बढ़ते-बढ़ते 

चेतना अदृश्य-सी  

मानव रे!

तुम्हारा 

कोई हिसाब है...

जीते जी 

तुम्हें 

पत्थर होने में 

कितने वर्ष लगे? 

©रवीन्द्र सिंह यादव  




रविवार, 26 अप्रैल 2020

फ़सल और बारिश

यह घनघोर घटा

काली-काली

मुझे नहीं लगी

कतई निराली

करोना-काल में

आफ़त की क्या कमी थी 

जो फ़सल बर्बाद करने 

असमय बारिश भी आ गई

आसमान में लपलपाती 

मेघप्रिया सौदामिनी

खलिहान जलाती  

गूँजती भरपूर  

डरावनी गड़गड़ाहट

किसान के दुश्मन

सरकारी फ़रमान  

हुआ करते  

अरे बादल तुम तो 

थोड़ा संयम धरते। 


© रवीन्द्र सिंह यादव 

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