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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

एक आवारा बदली


भुरभुरी भूमि पर उगे 
किरदार-से कँटीले कैक्टस
निर्जन परिवेश पर 
उकताकर कुंठित नहीं होते
ये भी सजा लेते हैं 
अपने तन पर काँटों संग फूल   
सुदूर पर्वतांचल में 
एक मोहक महक से महकती 
स्वागतातुर वादी  
रंग-विरंगे सुकोमल सुमनों से सजीं सुरम्य क्यारियाँ 
पुकारतीं तितलियों को 
कुसुम-दलों पर छिटकीं धारियाँ 
मधुमक्खियाँ मधुर पराग पीने पधारतीं 
एक आवारा बदली 
बरसने से पहले 
निहारती दोनों दृश्य।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  
   

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