साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
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गुरुवार, 21 जून 2018
मंगलवार, 24 जनवरी 2017
दोपहर बनकर अक्सर न आया करो
दोपहर बनकर
अक्सर न आया करो,
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
चिलचिलाती धूप में
तपना है दूर तक,
कभी शीतल चाँदनी
में भी नहाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
सुबकता है दिल
यादों के लम्बे सफ़र में,
कभी ढलते आँसू
रोकने आ जाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
बदलती है पल-पल
चंचल ज़िन्दगानी,
हमें भी दुःख-सुख में
अपने बुलाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
दरिया का पानी
हो जाय न मटमैला,
झाड़न दुखों की धारा में
यों न बहाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
#रवीन्द्र सिंह यादव
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