शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

वे कौन हैं ?

 

वे 

रहते हैं जहाँ भी

कभी कॉर्पोरेट के बंद केबिनों में 

तो कभी डिजिटल स्क्रीन के पीछे  

रचते हैं शोषण का अभेद्य चक्रव्यूह। 


वे 

गढ़ते हैं टूलकिट और सिंडिकेट 

ताकि बना सकें बंधक सच को 

अक्षम हैं लड़ने में अकेले
चुनते हैं अपना एकमत समूह। 

वे
पृष्ठभूमि में रहकर
रचते हैं षड्यंत्र,
एल्गोरिदम के पीछे छिपकर चलते हैं दूषित चालें
सामना हक़ीक़त का है उनके लिये दुरूह। 

वे
काग़ज़ी-क़ानूनों की ओट में,
हड़पते हैं किसी की बुनियादी साख।
न्यायप्रिय क़तई नहीं हैं
प्राकृतिक-न्याय के सिद्धांत पर काँपती है उनकी रूह। 

वे 
करते हैं मनमाना दुरुपयोग मशीनरी का 
फैलाते हैं अपना अजेंडा-प्रोपेगैंडा 
हो गये हैं गूलर के कीड़े रचते-रचते व्यूह 

वे
कौन हैं
जो दूसरों का हक़ मारते हैं
पहनते हैं झकाझक वाइट-कॉलर 
उनकी रग-रग जानता है जनसमूह!

©रवीन्द्र सिंह यादव   

Who are they?

  

Wherever they may be-

sometimes within

the close cabins of a corporate office,

at other times 

behind digital screens-

they weave 

an impenetrable labyrinth of exploitation.

 

They forge 

toolkits and syndicates

to hold the truth captive;

incapable of fighting alone,

they gather a like-minded pack.

 

They operate

from the shadows,

hatching conspiracies,

executing malicious schemes

while hidden behind algorithms for them,

confronting reality is an impossible task.

 

They,

under the cover of 

legal technicalities,

usurp the fundamental credibility of others.

They possess no sense of justice;

the very principle of natural justice 

make them tremble.

 

They

arbitrarily misuse 

the machinery of the state,

spread their own 

agenda and propaganda;

like insects dwelling within a fig,

They are consumed by

the constant weaving of self-centric schemes.

 

Who are they-

these people who trample upon the rights of others,

who cloak themselves in pristine,

'white-collar' respectability?

The masses know them through and through!

©Ravindra Singh Yadav




सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

नागरिक और सत्ता

सत्ता का रूप 

वीभत्स हो उठता है 

जब उसके हो जाते हैं 

नुकीले दाँत 

पैने-लंबे पंजों के नाख़ुन 

आँखों से विलुप्त शील 

ह्रदय में बैठ जाती है 

स्वार्थी संवेदनहीनता 

तब राजधानी की 

ख़ाकी सड़कों पर 

उसका क्रूर अमानवीय चेहरा

अट्टहास करता हुआ 

झूम-झूमकर थिरकता है 

मासूमों को कुचलकर  

करता है भयाक्रांत 

अपने ही 

निरपराध नागरिकों को

जो भाता है 

चंद चालाक धूर्तों को! 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

बहुत बीमार था वह दिन ...

वह बीमार दिन 

तड़प-तड़पकर गुज़रा 

नई दिल्ली में 

एक पचपन साल पुरानी 

बहुमंज़िला इमारत 

भरभराकर ढह गयी

सपने सजाने 

भविष्य सँवारने 

किरायेदार बन रहने आये थे 

देश के कर्णधार 

दब गये, कुचल गये 

माँ-बाप को छोड़ गये मझधार

सहायता के लिये तड़पते रहे 

मलबे से विडीओ भेजते रहे 

लँगड़ाती हुई सुबह   

अंधी होकर ढली धूप

कोलाहल से बहरी हुई रात 

निष्ठुर हो गुज़रती रही

लाश पर लाश गुज़रती रही 

दिन की तबियत बिगड़ती रही 

चिड़िया की आँख छलकती रही 

सीने में आग धधकती रही

बिना परों के पक्षी-सी संवेदना

अपनी विवशता पर हाथ मलती रही 

ओह!

बहुत बीमार था वह दिन...!  

©रवीन्द्र सिंह यादव    

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

एक हत्यारे के समर्थक का जवाब...

लौटा रही है  

आदिम-युग की ओर

आधुनिकता और 

भौतिकवाद से उत्पन्न 

सामाजिक जटिलता

प्रकृति-संसर्ग से विमुख 

यंत्रवत मानव समाज 

हिंस्रता, बर्बरता, जंगलीपन को 

दे रहा सरलता

एक हत्यारे के समर्थक से पूछा- 

"अपनी औलाद को 

क्या बनाओगे?" 

जवाब मिला-

"अच्छा पढ़ा-लिखा सफल-सभ्य इंसान।" 

©रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

जलप्रलय

जल जीवन है 
और मृत्यु भी 
बहार है 
तो विभीषिका भी

जल किलकारी है 
और चीख़ भी 
इंसानी दंभ को 
तोड़ती सीख भी

नींव, कंगूरा, 
दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे 
बह गये सब सपने 
उम्मीदें और भरोसे 

तोड़ता सीमाएँ 
सृष्टि का विकराल रूप  
आँचल माटी का 
धरता कैसे-कैसे रूप 

अल्ट्रा मॉडर्न तकनीक 
दृश्य क़ैद करती रही 
जलप्लावन की विकरालता में 
चीख़-पुकार दबती रही 

पुनः सजेंगे सँवरेंगे 
जिजीविषा के क्षितिज 
रोपे जाते रहेंगे  
इंद्रधनुषी आशाओं भरे बीज।    
©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 23 अगस्त 2026

शब्द-युग्म

उसके मुखारबिंद से 

उच्चरित हुआ  

एक शब्द-युग्म  

और लग गये 

होम वर्क पर हम

उसके संगी-साथियों ने 

सफ़ेद झूठ-सी सफ़ाई दी 

ढिंढोरची करने लगे मुनादी। 

उत्साही शोधकर्त्ता 

पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भ खोज लाये 

सामाजिक जवाबदेह व्यक्ति 

पिता-सा न ढूँढ़ पाये 

जो सिखाता रहा 

कौन कौआ, 

कौन कोयल हर बार

शब्द ऊर्जा रूप बदलती 

रहती संरक्षित संसार।   

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

छलनी

आओ

आशाओं को 

महीन छलनी में 

रखकर देखते हैं 

और फिर 

छलनी को 

हौले-हौले 

रीतते हुए देखते हैं

बस देखना है 

आशाएँ 

औंधे मुँह तो नहीं गिरीं

या कोई 

सुगबुगाहट तो नहीं हुई। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

वह जेन ज़ी नहीं जेन अल्फा भारत की बेटी...

 

आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी 

देखकर पुलिस की क्रूर बर्बरता 
निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों /महिलाओं पर 
पंद्रह वर्ष आयु पाने से नौ दिवस पूर्व 
दे आयी थी गाली प्रधानमंत्री को जंतर-मंतर पर 
पहचान उजागर कर दी 
डिजिटल हिंसा के ठेकेदारों ने 
एक स्त्री ही खड़ी हो गयी 
उस बेटी को क़ानूनी सबक़ सिखाने को 
धँसे गले से नज़र झुकाये आयी वीडिओ में 
सिटपिटाई-सी सार्वजनिक माफ़ी माँगने को
आत्मग्लानि से भर गया समूचा देश
देख क्रूर अट्टहास का वीभत्स परिवेश
विकृत राजनीति के समक्ष विवश-लाचार हुई प्रबुद्ध मानवता
माँ-बेटी स्वयं लड़ीं दहशत-घृणा से, दबाये भाव-विह्वलता
भीड़-तंत्र के न हो हवाले हमारा प्यारा देश
शराफ़त अब और न रहो अपाहिज-ख़ामोश!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


गुरुवार, 23 जुलाई 2026

युवाशक्ति

  युवा-पीढ़ी को समर्पित मेरी यह कविता सन 1998 में आकाशवाणी ग्वालियर म.प्र.से प्रसारित हुई थी. आज पुनः स्मृति में गूँज उठी-


युवा हूँ मैं

निरुत्साह से अनछुआ हूँ मैं

अक्षय ऊर्जा का भंडार हूँ मैं 

दक्षता धारण किये निडर हूँ मैं 


सभ्यता के अथाह सागर की गोद में 

अस्तित्त्व में आया हुआ द्वीप हूँ मैं 

घृणा के गान से उपजी 

प्रचंड आँधियों के बीच जलता हुआ दीप हूँ मैं 


घात-प्रतिघात के कठिन दौर से 

बेख़ौफ़ गुज़र रहा हूँ मैं 

ज़माने की नज़र में अब 

चुभता नहीं, सुधर रहा हूँ मैं 


गीदड़ों के कोलाहल में 

गूँजता हुआ सिंहनाद हूँ मैं 

घनेरे बादलों को चीरकर 

निकला हुआ शुभ्र चाँद हूँ मैं!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


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सोमवार, 22 जून 2026

सीढ़ी जो उदास थी...


                             चित्र साभार : गूगल 

बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान 

रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान

बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जाते हैं सीढ़ी 

भूतल को सँभलकर उतरते हैं सीढ़ी 


ममता, प्रेम, घृणा, आकांक्षा 

सब चढ़े-उतरे हैं सीढ़ी से 

निर्माता के उर में उतर गयी है 

भव्य नियोजित सीढ़ी-दर-सीढ़ी 


इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास 

लिखेगा कोई धीर शोधार्थी 

आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या 

सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.

©रवीन्द्र सिंह यादव

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वे कौन हैं ?

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