वे
जहाँ भी रहते हैं
रचते हैं शोषण का चक्रव्यूह
वे
अक्षम हैं अकेले लड़ने में
चुनते हैं अपना समूह
वे
पृष्ठभूमि में रहकर
रचते हैं षड्यंत्र
सच का सामना करना है उनके लिये दुरूह
वे
न्यायप्रिय क़तई नहीं हैं
प्राकृतिक-न्याय के सिद्धांत पर काँपती है उनकी रूह
वे
कौन हैं
जो दूसरों का हक़ मारते हैं
उनकी रग-रग जानता है जनसमूह!
©रवीन्द्र सिंह यादव


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