ज़िंदा मछली धारा के विरुद्ध ही तो तैरती है
जूझती है लहरों से, तब जाकर साँस लेती है
कहावतों-मुहावरों में समाहित है मछली
कविता-कहानी,ग्रंथों में अवतरित है मछली
कहीं सजावट है तो कहीं भोजन है मछली
अब बड़े व्यापार का प्रयोजन है मछली
मासूम की कविता की मधुर तुकबंदी है मछली
एक्वेरियम के सीमित जल में आज बंदी है मछली
सारा पानी ज़हरीला हुआ, फिर भी कैसे जिये मछली?
घुटकर भी इस माहौल में, औरों के काम आ रही मछली।
©रवीन्द्र सिंह यादव



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