वे
रहते हैं जहाँ भी
कभी कॉर्पोरेट के बंद केबिनों में
तो कभी डिजिटल स्क्रीन के पीछे
रचते हैं शोषण का अभेद्य चक्रव्यूह।
वे
गढ़ते हैं टूलकिट और सिंडिकेट
ताकि बना सकें बंधक सच को
रचते हैं षड्यंत्र,
एल्गोरिदम के पीछे छिपकर चलते हैं दूषित चालें
सामना हक़ीक़त का है उनके लिये दुरूह।
हड़पते हैं किसी की बुनियादी साख।
न्यायप्रिय क़तई नहीं हैं
प्राकृतिक-न्याय के सिद्धांत पर काँपती है उनकी रूह।
कौन हैं
जो दूसरों का हक़ मारते हैं
उनकी रग-रग जानता है जनसमूह!


.jpg)




