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मंगलवार, 1 जून 2021

बहुत दुःख दिए तूने ऐ करोना

लॉक डाउन 

फिर भी व्यस्त सड़कें

शहर से लेकर गाँव तक 

कुछ साहसी-मजबूर 

दौड़ रहे हैं 

लिए दवाएँ-ऑक्सीजन 

ताकि सांसें टूट न सकें

करोना से जूझते 

वैज्ञानिक 

डॉक्टर 

सहायक स्टाफ़ 

सफ़ाईकर्मी

वाहन-चालक

सुरक्षाकर्मी

ज़मीनी-पत्रकार  

स्वयंसेवी आदि 

देखते जब   

मृत देहों का अंबार

सुनते जब  

संबंधियों-मित्रों शुभचिंतकों की 

चीख़ें और सिसकियाँ

छितराई परेशानी की लकीरें 

असहज पीपीई-किट फ़ेस-शील्ड से ढके 

बेचैन चेहरों पर 

रखते मन-मस्तिष्क पर क़ाबू  

रोककर अपने दिल का रोना 

जुट जाते दुगनी ऊर्जा से 

बचाने सांसों की टूटती डोर

थम रही है 

करोना की दूसरी लहर 

देखेंगे हम राहत का भोर 

किसी को भोगना है वैधव्य 

कोई हुआ अनाथ 

छूटा किसी के 

माता-पिता का साथ

बिछड़ गई किसी की संगिनी 

किसी को छोड़ गई भगिनी 

किसी ने प्यारी बेटी खोई

बेटे के वियोग में 

कोई आँख फूट-फूटकर रोई 

एक वायरस ने 

दे डाली दुनिया को चुनौती

शोध जारी है 

मुकम्मल इलाज के लिए 

काश!वैक्सीन की हालत 

एक अनार सौ बीमार-सी न होती

आशाओं के ग़ुंचे 

ज़रूर खिलखिलाएँगे

वक़्त के दिए ज़ख़्म 

धीरे-धीरे भर जाएँगे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव    

शनिवार, 2 मई 2020

कमाल का भरोसा है उनका

आप जानते हैं 

समानांतर रेल-पटरियों (ब्रॉड गेज़) के बीच की दूरी 

कितनी तय है?

1676 मिलीमीटर 

एक मीटर सरसठ सेंटीमीटर छह मिलीमीटर 

पाँच फ़ुट छह इंच

मैं यह हिसाब 

आपको क्यों समझा रहा हूँ? 

क्योंकि भारत में 

पुरुष की औसत लंबाई भी 

लगभग यही है

अब यहाँ ख़ास / ध्यानाकर्षक बात यह है कि 

आज मैंने 

रेल-पटरियों के मध्य 

एक ओर 

पटरी को सिरहाना समझ

इत्मीनान से सर रखे   

दूसरी ओर पाँव पसारे

लकड़ी / सीमेंट के स्लीपर पर 

टिकाए पीठ  

बेफ़िक्र सोते हुए

कृशकाय मज़दूर देखे

लाचारी में क़ानून तोड़ते

भारत के मजबूर देखे   

कमाल का भरोसा है उनका

नींद में भी सजग रहने पर  

सरकारी आदेश पर 

लॉक डाउन में 

रेल चक्काजाम पर

उन्हें नहीं मालूम 

बेरहम सरकार 

कब अपना आदेश बदल दे! 

कब विशेष ट्रैन चला दे!

चिरनिद्रा में न सुला दे...! 

© रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

लॉक डाउन में दादी का प्रश्न

दादी दबी आकांक्षाएँ लिए

पेशानी पर तेवर लिए

बेकसी का दौर 

चेहरे पर लिए

  बूढ़ी आँखों में   

प्रश्न-ख़ंजर लिए

पूछती पोती से

पैंतीसवें दिन

लॉक डाउन

कब ख़त्म होगा?

अपने गाँव जाना है

अपनों के बीच मरना है

बची सांसें ओसारे में पूरी करनी हैं

शहरी घुटन में क्या उम्र पूरी करनी है?

अजीब शहर है 

न धूप खुली 

न हवा खुली 

न खुला मन 

मोबाइल में व्यस्त 

अबाल-वृद्धजन  

दिखती ज़िंदा हूँ

मरी-सी हूँ!

समझी...! 

©रवीन्द्र सिंह यादव    

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

लॉकडाउन

उस ख़ामोश स्थितिप्रज्ञ 

पहाड़ी तक 

जाना चाहता हूँ 

उस चरवाहे की 

बाँसुरी की 

मद्धिम मधुर धुन  

सुनना चाहता हूँ 

भेड़-बकरियों के झुंड की 

हलचल देखना चाहता हूँ 

चरवाहे के कुत्ते की निष्ठा 

महसूसना चाहता हूँ

पहाड़ी की ऊँचाई से 

गहरी खाई में 

सूर्य-किरणों को चूमने 

गर्दन लंबी करते विशाल वृक्षों को 

निहारना चाहता हूँ 

सुदूर पहाड़ी से झरते 

श्वेताभ झरने से उठता 

रुपहला धुआँ

ह्रदय-कपाटों में 

उड़ेलना चाहता हूँ...   

क्योंकि 

नियति-चक्र 

अनवरत, अबाध, अविराम अपनी ड्यूटी पर 

मानव-ज़ात विज्ञान की सुझायी सलाह पर 

बस्तियों-बसेरों में क़ैद है  

काश!

लॉकडाउन ख़त्म होने का 

अनुकूल वक़्त हो! 

और मैं 

उस पहाड़ी पर पहुँचकर 

प्रकृति की गोद में 

सर रखकर 

सुकून की गहरी नींद सो जाऊँ

पुनः तर-ओ-ताज़ा होकर 

अपने कर्तव्य पर डट जाऊँ। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...