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बुधवार, 13 नवंबर 2019

एहसासात का बे-क़ाबू तूफ़ान







दिल में आजकल 

एहसासात का  

बे-क़ाबू तूफ़ान 

आ पसरा है, 

शायद उसे ख़बर है 

कि आजकल 

वहाँ आपका बसेरा है।



ज़िंदगी में 

यदाकदा 

ऐसे भी मक़ाम आते हैं, 

कोई अपने ही घर में 

अंजान बनकर 

सितम का नाम पाते हैं।



कोई किसी को 

भूलता कहाँ है 

दर्द, गिला, ख़ता

यादों का सिलसिला

 हिज्र में नूर-ए-सहर है,

ज़िंदगी का यक़ीन 

मोहब्बत से ही तो हसीं है 

ज़माना कहता रहा 

कल से आज तक 

इक़रार का एतिबार 

पहर-दर-पहर है।  


ग़ुरूर तो पालो ज़रूर 

वक़्त गुज़रता है 

संग-ए-याद पर 

लिखती जाती है 

मख़मली उल्फ़त की कहानी,

चमन में उम्मीदों के ग़ुंचे

खिलते हैं बहार के इंतज़ार में 

फ़ासले बढ़ जाते हैं 

फ़साना-ए-दिल में ज़िक्र के लिए  

बचती है कसक की निशानी। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 


सोमवार, 19 अगस्त 2019

नीड़


निर्माण न्यारे नीड़ का 

नित-नित  करती, 


वह नन्ही चिड़िया 


जोखिमभरी ज़िद करती। 


बस्तियाँ ही बस्तियाँ हैं 


तिनके अब 

बहुत दूर-दूर मिलते,


वृक्ष रोपने निकले  

आवारा राही के 


नक़्श-ए-क़दम नहीं मिलते।


ख़ामोशियों में डूबी 


चिड़िया उदास नहीं, 


भले ही दरिया-ए-ग़म का 


किनारा भी अब पास नहीं। 


गुज़रना है ख़ामोशी से 

दिल में ख़लिश 

ता-उम्र सब्र का साथ लिए, 


फल की चिंता किए बग़ैर

कर्मरत है चिड़िया  

ख़ुद से जीने का समझौता किए। 

शजर की शाख़ पर 

हालात से लड़कर 


संजोया है प्यारा नशेमन 

कुछ लम्हात के लिए,

हालात की आँधी में  

पालना है पीढ़ी को 


हो क़ाबिल ऊँची उड़ान के लिये।  


© रवीन्द्र सिंह यादव 


शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

सुनो मेघदूत!



सुनो मेघदूत!

अब तुम्हें संदेश कैसे सौंप दूँ, 

अल्ट्रा मॉडर्न तकनीकी से, 

गूँथा गया गगन,

  ग़ैरत का गुनाहगार है अब, 

राज़-ए-मोहब्बत हैक हो रहे हैं!

हिज्र की दिलदारियाँ, 

ख़ामोशी के शोख़ नग़्मे, 

अश्क में भीगा गुल-ए-तमन्ना, 

फ़स्ल-ए-बहार में, 

धड़कते दिल की आरज़ू, 

नभ की नीरस निर्मम नीरवता-से अरमान,

 मुरादों और मुलाक़ात का यक़ीं, 

चातक की पावन हसरत, 

अब तुम्हारे हवाले करने से डरता हूँ, 

अपने किरदार से कुछ कहने, 

अब इंद्रधनुष में रंग भरता हूँ। 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

सोमवार, 19 नवंबर 2018

नदी तुम माँ क्यों हो .....

नदी तुम माँ क्यों हो...?

सभ्यता की वाहक क्यों हो...?

आज ज़ार-ज़ार रोती क्यों हो...?   

बात पुराने ज़माने की है 

जब 

गूगल 

जीपीएस

स्मार्ट फोन  

कृत्रिम उपग्रह 

पृथ्वी के नक़्शे 

दिशासूचक यंत्र 

आदि नहीं थे 

एक आदमी

अपने झुण्ड से 

जंगल की भूलभुलैया-सी 

पगडंडियों पर चलते-चलते 

पैर की नस दबने / चढ़ने / तड़कने से 

भटककर छिटककर बिछड़ गया 

घिसटते-घिसटते 

अग्रसर हुआ 

ऊँचे टीले से 

साथियों को 

आवाज़ लगायी 

कोई सदा  लौट के आयी

बस प्रतिध्वनि ही 

निराश लौट आयी 

सुदूर क्षितिज तक 

व्याकुल थकी नज़र दौड़ायी 

घने वृक्षों के बीच 

नीलिमा नज़र आयी 

जीने की आस जागी 

आँखों में रौशनी जगमगायी

हिम्मत करके उतरा 

ऊँघती कटीली घाटियों में 

चला सुनसान वन में

उस नीलिमा की ओर 

दर्द सहते-सहते हौले-हौले 

पैर को जकड़ा 

नर्म वन लताओं से 

रास्ता तय किया 

एक टीला और मिला 

अब एक नदी नमूदार हुई

चलते-चलते तन से 

निचुड़ा पानी

प्यासे को लगा 

ख़त्म हो जायेगी कहानी 

बढ़ती प्यास ने 

दर्द विस्मित किया 

प्यासे और नदी के बीच 

दूरी न्यूनतर होती गयी 

नदी से कुछ ही दूरी पर 

मूर्छा आने लगी 

पाकर नदी का किनारा 

राहत की साँसें भी भारी हुईं 

तपती रेत में 

बोझिल क़दमों  से 

प्यासा चला 

उभरे पाँवों में 

छालों ने छला  

अब नदी का पानी 

कुछ ही क़दम दूर था 

पाँवों में प्यासे को 

ठंडक महसूस हुई 

लगा ज्यों माँ ने 

लू लगने पर 

तलवों में बकरी का दूध  

और प्याज़ का रस मला हो 

नस तड़की और 

गिर पड़ा औंधे मुँह 

चरम पर थी प्यास और पीर 

बस दो हाथ की दूरी पर था

कल-कल करता बहता 

नदिया का निर्मल नीर  

जलपक्षी जलक्रीड़ा में थे मग्न 

बह रही थी तपिश में 

राहतभरी शीतल पवन  

घिसटकर पानी तक 

पहुँचने की हिम्मत  रही 

एक लहर आयी 

मुँह को छुआ  

लगा जैसे माँ ने 

पिलाया हो पानी 

लगाकर ओक 

जीवन तरंगित हुआ

बिखरा जीवन आलोक 

बैठकर जीभर पानी पिया

जिजीबिषा जीत गयी 

पाकर क़ुदरत का वरदहस्त 

प्यास बुझाकर प्यासे ने  

नदी को माँ कहकर

श्रद्धा से सम्बोधित किया  

साधुवाद दिया 

यह ममता बढ़ती रही

कालान्तर में 

आस्था हो गयी  

इंसान ने नदी को 

माँ जैसा मान-सम्मान 

देने का विचार दिया

परम्पराओं-वर्जनाओं का 

रोपड़-अनुमोदन किया 

नदियों के किनारे 

सभ्यताओं ने 

पैर पसारने का  

अनुकूल निर्णय लिया 

जीवनदायिनी नदिया का 

आज हमने क्या हाल किया है?

समाज का सारा कल्मष 

नदियों में उढ़ेल दिया

क्या फ़ाएदा 

इस ज्ञान-विज्ञान 

आधुनिक तकनीक 

सभ्य समाज की 

तथाकथित समझदारी  का

जिसने इंसान को 

प्रकृति की गोद से 

जबरन अलहदा किया!! 

© रवीन्द्र सिंह यादव



शनिवार, 17 नवंबर 2018

चिड़िया और इंसान



चिड़िया और इंसान

हैं सदियों पुराने मित्र,

सभ्यता के सफ़र में

चिड़िया वही इंसान विचित्र।


छोटी-सी ज़िंदगानी में

चिड़िया अपने बच्चों को

सिखाती है ढेरों उपाय

बाज़, उल्लू, बिल्ली, साँप-से

शिकारियों से बचाव।


दूर क्षितिज तक उड़ना

पानी-धूल में नहाना

दाना चुगना 

नीड़ का निर्माण करना   

फुदकना चहचहाना 

साँझ-सकारे सामूहिक गान

सामूहिकता में सौहार्द सहमति 

समृद्धि हेतु क़ाएम रखना।


इंसान अपने बच्चों को

जीवनभर सिखाता है

जीने की गूढ़ कला,

फिर भी अब तक

इंसानी-समाज  

मन-मुआफ़िक़ क्यों नहीं ढला?
   
© रवीन्द्र सिंह यादव

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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...