दिल में आजकल
एहसासात का
बे-क़ाबू तूफ़ान
आ पसरा है,
शायद उसे ख़बर है
कि आजकल
वहाँ आपका बसेरा है।
ज़िंदगी में
यदाकदा
ऐसे भी मक़ाम आते हैं,
कोई अपने ही घर में
अंजान बनकर
सितम का नाम पाते हैं।
कोई किसी को
भूलता कहाँ है
दर्द, गिला, ख़ता
यादों का सिलसिला
हिज्र में नूर-ए-सहर है,
ज़िंदगी का यक़ीन
मोहब्बत से ही तो हसीं है
ज़माना कहता रहा
कल से आज तक
इक़रार का एतिबार
पहर-दर-पहर है।
ग़ुरूर तो पालो ज़रूर
वक़्त गुज़रता है
संग-ए-याद पर
लिखती जाती है
मख़मली उल्फ़त की कहानी,
चमन में उम्मीदों के ग़ुंचे
खिलते हैं बहार के इंतज़ार में
फ़ासले बढ़ जाते हैं
फ़साना-ए-दिल में ज़िक्र के लिए
बचती है कसक की निशानी।
© रवीन्द्र सिंह यादव



