अनिश्चितता
असुरक्षा
अस्थिरता का
दौर था कभी
तत्कालीन परिस्थितियोंवश
पूर्वाग्रही मंशा से
पूर्वाग्रही मंशा से
स्त्री को
जकड़ा गया
वर्जना की सख़्त बेड़ियों में
वर्जनाओं की मज़बूत कड़ियों में
सामाजिक नियमावली के
सुनहरे कड़े जाल में
स्वतंत्रता से
रहे परे
हर हाल में
आज स्थिरता का
अनुकूल दौर है
क़ानून हैं
सहूलियतें हैं
अवसर हैं
भौतिकता का अंबार है
अपराध का बाज़ार है
परिभाषित रिश्ते हैं
गौरव है
गरिमा है
गरिमा है
पद है
किंतु
आज भी
उसकी एक हद है
थमा दिया गया उसे
अदृश्य घोषणा-पत्र
जिसमें
"डूज़ एन्ड डोंट"
सीमाओं की लकीरें
हाईलाइट हो जाती हैं
फ्लोरोसेंट लाइट में
चमकती रहती हैं
सतत एहसास दिलाने के लिए
कि स्वतंत्रता दूर की कौड़ी है!
© रवीन्द्र सिंह यादव