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बुधवार, 14 सितंबर 2022

मिसरी की डली के लिए

आईना दिखाने वाले 

कहाँ ग़ाएब हो गए?

शायद वे 

घृणा का गान सुनते-सुनते 

लहू का घूँट पीते-पीते 

जान की फ़िक्र में पड़ गए...

ऐब तो दूसरे ही बता सकते हैं

इस कथन के भी पाँव उखड़ गए... 

हरा-भरा है देश हमारा 

फिर मिसरी की डली के लिए 

एक मासूम की आँखों में 

गहरी उदासी क्यों है?

कहते हो 

क़ानून का राज है देश में 

तो फिर 

हत्यारों, बलात्कारियों;दंगाइयों को 

मिल रही शाबाशी क्यों है? 

तुम आईना तोड़ भी दो

अपने इंतज़ामों से 

हम कदापि न घबराएँगे  

वक़्त गर्दन पकड़कर 

झुकाएगा एक दिन  

तुम्हारा वीभत्स चेहरा 

मक्कारियाँ उसकीं 

चुल्लूभर पानी में हम दिखाएँगे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव   


गुरुवार, 15 नवंबर 2018

आईना


छींक अचानक आयी 
सामने था आईना,
क्या रखते हो अन्दर  
धुँधला हुआ आईना।

वक़्त--तपिश 
लेकर आयी गर्म हवा,  
धुँध छँट  गयी और 
साफ़ हुआ आईना। 

देखकर ख़ुद को 
ग़ुरूर था आसमान पर,
अपने-सा दिखा तो 
ना-गवार हुआ आईना।  

दरकतीं हैं बुलंद से बुलंद 
इमारतें ज़माने में
टूटा फिर भी पहचान से 
महरूम हुआ आईना। 

सहम जाते हैं लोग 
देखकर अपनी हक़ीक़त
बेरहम कभी मुद्दई 
कभी मुंसिफ़ हुआ आईना। 

औरों की आँखों में 
देख लेते हैं अक्स अपना
फिर भी ज़माने की 
दरकार हुआ आईना। 

जमती रहती है धूल 
गर रोज़ साफ़ किया
 हो अपनी नज़रों से गिरना    
निहायत ज़रूरी हुआ आईना। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

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