आईना दिखाने वाले
कहाँ ग़ाएब हो गए?
शायद वे
घृणा का गान सुनते-सुनते
लहू का घूँट पीते-पीते
जान की फ़िक्र में पड़ गए...
ऐब तो दूसरे ही बता सकते हैं
इस कथन के भी पाँव उखड़ गए...
हरा-भरा है देश हमारा
फिर मिसरी की डली के लिए
एक मासूम की आँखों में
गहरी उदासी क्यों है?
कहते हो
क़ानून का राज है देश में
तो फिर
हत्यारों, बलात्कारियों;दंगाइयों को
मिल रही शाबाशी क्यों है?
तुम आईना तोड़ भी दो
अपने इंतज़ामों से
हम कदापि न घबराएँगे
वक़्त गर्दन पकड़कर
झुकाएगा एक दिन
तुम्हारा वीभत्स चेहरा
मक्कारियाँ उसकीं
चुल्लूभर पानी में हम दिखाएँगे।
© रवीन्द्र सिंह यादव
