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बुधवार, 13 जनवरी 2021

समझ अब देर तक राह भूली है


देख रहा है सारा आलम

खेतों में सरसों फूली है

ओस से भीगी शाख़ पर 

नन्ही चिड़िया झूली है 

परेड की चिंता न समिति की फ़िक्र

हँसिया के बियाह में खुरपी का ज़िक्र 

खेत के पहरेदारों संग अनशन में बैठे

सत्ता की नज़रों में वे गाजर-मूली हैं 

ख़ुद के कंधों पर ख़ुद को ढोना

उनसे सीख लो मगर-सा रोना

लज्जाहीन न समझेंगे अब वो 

दंभ में अक्ल राह अब भूली है।

© रवीन्द्र सिंह यादव

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