देख रहा है सारा आलम
खेतों में सरसों फूली है
ओस से भीगी शाख़ पर
नन्ही चिड़िया झूली है
परेड की चिंता न समिति की फ़िक्र
हँसिया के बियाह में खुरपी का ज़िक्र
खेत के पहरेदारों संग अनशन में बैठे
सत्ता की नज़रों में वे गाजर-मूली हैं
ख़ुद के कंधों पर ख़ुद को ढोना
उनसे सीख लो मगर-सा रोना
लज्जाहीन न समझेंगे अब वो
दंभ में अक्ल राह अब भूली है।
© रवीन्द्र सिंह यादव
