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शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

क़ानून के हाथ लंबे होते हैं
























उस दिन 

वह शाम 

काले साये में लिपटती हुई 

रौशनी से छिटकती हुई 

तमस का लबादा लपेटे 

जम्हाइयाँ लेती नज़र आयी थी 

तभी गुलशन से अपने बसेरे को 

लौटती नवयुवा तितली

उत्साही दुस्साहस की सैर  

की राह पर चल पड़ी

राह भटकी तो 

भूखे वीरान खेतों की 

मेंड़ों से होकर जाती 

क्षत-विक्षत पगडंडी पर   

चल पड़ी 

बाँसों के झुरमुट से 

आ रहे थे हवा के अधमरे झोंके 

वाहियात सन्नाटा 

दिमाग़ के किवाड़ों की खड़खड़ाहट 

चंचल हवा की फिसलन से 

डरावना माहौल सृजित कर रहा था 

शहर की तरफ़ आते 

सियार से राब्ता हुआ 

सड़ांध मारते पिंजर को 

मौक़ा पाकर मुँह मारते 

कौए, कुत्ते, सियार और गिद्ध से 

न चाहते मुक़ाबिल हुई 

अपने डैने फैलाकर शिकार पर 

आँखें गढ़ाती बाज़ की हिंसक नज़र   

तोते के बच्चे चहचहाते मिले 

शुष्क ठूँठों के कोटरों से झाँकते

तितली सहम गयी 

जब उसने सुनी 

एक दिल दहलाती चीख़

आक्रोश में सराबोर चीत्कार 

कुछ बहसी दरिंदे 

अपने-अपने सर ढाँपकर 

अप्राकृतिक कृत्य करते मिले 

तितली रुकी और अपना 

विचारों का ख़ुशनुमा रोमाँचक सफ़र 

अधूरा छोड़ / गरिमा से आहत हो 

लौट आयी शहर की ओर 

सीधे पुलिस-थाने पहुँची 

जहाँ चल रही थी दारु-पार्टी 

थकी-हारी अलसाई तितली 

बैठ गयी दीवार पर 

याचना का भाव लेकर 

ख़तरों से चौकन्ना होकर

छिपकली ने छलाँग लगायी

तितली जैसे रंगीन शिकार पर 

औंधे मुँह जा गिरी 

मेवा मिश्रित नमकीन की प्लेट में 

पार्टी का मज़ा किरकिरा हुआ 

दीवार पर सहमी चिपकी 

एक पुलिसमैन की आँखें 

टिक गयीं मासूम तितली पर 

तितली ने भी अपनी दारुण याचना 

उन सच्ची आँखों में उड़ेल दी

सम्मोहित किया पुलिसमैन को 

उसने मोबाइल निकाला 

वीडियो सूट करता हुआ 

तितली का अनुसरण करता हुआ 

पहुँचा घटनास्थल पर 

और ख़ुद को कोसने लगा 

तितली को मन ही मन नमन किया

धन्यवाद किया 

क़ानून के हाथ लंबे होते हैं 

यह जताने के लिये / सोया ज़मीर जगाने के लिये! 

 © रवीन्द्र सिंह यादव 



गुरुवार, 13 जुलाई 2017

तितली


जागती है
रोज़ सुबह
एक तितली,
बाग़ में खिले
फूलों-कलियों से
है बाअदब मिलती।


खिले रहो
यों ही
संसार को देने
आशाओं का सवेरा,
मुस्कराकर
अपना दर्द छिपाये
फूलों-कलियों में
दिनभर है  करती बसेरा।



फूलों से  कहती है -
तुम्हारी
कोमल पंखुड़ियों के
सुर्ख़  रंग
केवल मुझे
ही नहीं लुभाते हैं,
मधुर  रसमय राग
जीवन संगीत का
ये सबको सुनाते  हैं।


फूल तुम
यों ही
खिले रहना,
मदमाती
ख़ुशबू से
कल सुबह तक ...
यों ही
महकते रहना।



अनमना होता है
फूल उस पल
वक़्त आ  खड़ा
होता है जब
मुरझाने की
नियति  का
सवाल होकर ,
कलियाँ
कल तुम्हारा हैं
बीज परसों तुम्हारे हैं
कहती मूक  तितली
फूल से वाचाल  होकर।



कल फिर मैं आऊँगी
तुम इंतज़ार करना,
सब्र के साथ
अँधेरी रात पार करना।

@रवीन्द्र सिंह यादव


मंगलवार, 10 जनवरी 2017

फूल से नाराज़ होकर तितली सो गयी है



फूल   से  नाराज़   होकर

तितली    सो      गयी     है,

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(1 )




हो   चला   सयाना    फूल  

ज़माने   के    साथ-साथ ,

मुरझाई    हैं    पाँखें  

महक   भी    रो    गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(2  )





नसीहत  अब  कोई

हलक़   से  नीचे  जाती   नहीं,

दिल्लगी   की   प्यारी  खनक

अब   हमसे   खो  गयी   है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(3  )





आशियाँ    दिलक़श   बने

जो    तेरी   शोख़ियाँ  हों,

ताज़ा  हवा  आँगन  में

बीज-ए -ख़ुलूस  बो  गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(4 )





यादों   के   आग़ोश   में

बैठा   हुआ  है  बोझिल  दिल,

एक   मुलाक़ात  मैल  मन  का

मनभर   धो     गयी    है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(5 )


 @रवीन्द्र  सिंह  यादव






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