जीवन के भयावह झंझावात से
गुज़र रहे हैं हम
उजाले धुँधले हुए जाते हैं
छा रहा अनचीता तम ही तम
उन्हें देखो
जो भयमुक्त होकर डट गए हैं
सुरीला संगीत
फूलोंभरा बिस्तर
रिश्तों की डोर
किताबोंभरी अलमारी
मुस्कुराती बांसुरी
शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव
परे रख
आत्मप्रचार से परे
करोना वायरस से लड़ने
इस ज़मीं को बेहतर बनाने
अकेले कंधे पर हाथ रखने
वक़्त की सलवटें मिटाने
जुट गए हैं
दर्द की बूँदें बरसने के बाद
इंद्रधनुषी आभा की आस में
जीवन के प्रति अनुराग के बीज
बस्ती-बस्ती के प्रभामंडल में बोने।
© रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ
झंझावात = आँधी, तूफ़ान, प्रचंड वेग से बहती वायु
अनचीता = सहसा घटित होने वाला,अनचाहा

