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शनिवार, 9 मई 2020

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव


जीवन के भयावह झंझावात से 

गुज़र रहे हैं हम 

उजाले धुँधले हुए जाते हैं 

छा रहा अनचीता तम ही तम

उन्हें देखो 

जो भयमुक्त होकर डट गए हैं 

सुरीला संगीत 

फूलोंभरा बिस्तर 

रिश्तों की डोर 

किताबोंभरी अलमारी

मुस्कुराती बांसुरी

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव    

परे रख 

आत्मप्रचार से परे 

करोना वायरस से लड़ने 

इस ज़मीं को बेहतर बनाने

अकेले कंधे पर हाथ रखने  

वक़्त की सलवटें मिटाने

जुट गए हैं 

दर्द की बूँदें बरसने के बाद 

इंद्रधनुषी आभा की आस में

जीवन के प्रति अनुराग के बीज  

बस्ती-बस्ती के प्रभामंडल में बोने।

© रवीन्द्र सिंह यादव  


शब्दार्थ     

झंझावात = आँधी, तूफ़ान, प्रचंड वेग से बहती वायु 

अनचीता = सहसा घटित होने वाला,अनचाहा  

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