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मंगलवार, 31 जनवरी 2017

ओस और मुनिया



जब

वातावरण में

समाहित  वाष्प  को

सिकोड़   देती  है  सतह  की  ठंडक,

तब

शबनम के दाने / ओस के मोती,

फूल-पत्तियों      पर      आसन     जमाते    हैं,

हमारे  मरने-मिटने  के  भय  को  लजाते   हैं।


मुनिया    समझदार    हुई,

पाँच    बसंत     पार    हुई,

बोली  एक   इतवार  को-

"पार्क  में  मैं  भी  चलूँगी,

कुलाँचें   मैं  भी  भरूँगी...!"


सवालों-जवाबों  के  बीच  पहुँचे  पार्क,

चमका   रही    थीं  ओस-कणों   को,

भोर      की     मनहर      रवीना,

ये  क़ुदरत  के आँसू   हैं  या  पसीना...?

कवितामयी / छोटे  मुँह   बड़ी  बात...!

सीधा  मन-मस्तिष्क  पर लुभावना आघात।


मैंने   कहा-

यह   ओस   है,

उसने कहा-

"ENGLISH  में   बताओ"

"DEW...!" -जवाब  मैंने  दिया,

इसे  तो  मेरे  टीचर  ने  वीडियो  में  दिखाया  था...

सुनकर  मेरे  सपनों  पर  ओस  पड़   गयी!

घर  आते-आते   सारी   ओस  झड़  गयी!!

©रवीन्द्र  सिंह यादव









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