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शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

सर्दी

 

चित्र:महेन्द्र सिंह 

सर्दी तुम हो बलवान 

कल-कल करती नदी का प्रवाह 

रोकने भर की है तुम में जान

जम जाती है बहती नदी 

बर्फ़ीली हवाओं को तीखा बनाने 

आती हो निरीह को सहना सिखाने  

तुम जब कोहरे के पंख लेकर 

उतरती हो धरा पर 

दृष्टि क्षमता घट जाती है जीव की

चिड़िया भी उड़ नहीं पाती पर पसार कर   

अदृश्य हो जाते हैं भानु,शशि और सितारे

भौतिक जीवन चलता है तकनीक के सहारे 

एक ह्रदय है 

धड़-धड़ धड़कता रहता है जीवनभर अनवरत 

जमने नहीं देता धमनियों-शिराओं में बहता रक्त

इसके भी अपने मौसम हैं 

अंगों के सह-अस्तित्त्व को सहेजे  

कुछ मनचीते 

कुछ बोझिल-से!    

©रवीन्द्र सिंह यादव




शनिवार, 2 दिसंबर 2023

अँधेरा-उजाला और भूख

चित्र:महेन्द्र सिंह 

रात का काजल कितना काला 

भोर प्रतीक्षा-सा हुआ निवाला  

देती चिड़िया चूजों को आश्वासन

सूरज निकले तब मिलेगा राशन

अनमनी रवीनाएँ ले-ले जम्हाई

बिखरा देंगीं धूप जो है अलसाई

भूख से लड़ने भरेंगे पंख उड़ान

किसके माफिक हुआ है जहान?

©रवीन्द्र सिंह यादव 


शब्दार्थ:

1. निवाला (हिंदी) = कौर,गस्सा,ग्रास 

2. राशन / RATION (English) = खाद्यान्न आदि का निश्चित व नियंत्रित मात्रा में वितरण,रसद (अरबी,फ़ारसी)

3. अनमनी (हिंदी) = बेमन से, अप्रसन्न

4.रवीनाएँ = सूरज की किरणें,रश्मियाँ 

5.जम्हाई (हिंदी)  = उबासी, जागते समय मुँह के खुलने की स्वाभाविक प्रक्रिया,जँभाई (देशज), उच्छ्वास (संस्कृत) 

6. अलसाई (हिंदी) = आलसयुक्त,आलस से भरी, सुस्त

7.माफिक (संस्कृत) = अनुकूल,अनुसार, मुवाफ़िक़ (अरबी) 

8.जहान/जहाँ (फ़ारसी) = संसार,दुनिया,लोक,जगत्


     

शुक्रवार, 26 मई 2017

सरिता

नदी  का  दर्द... 


कल-कल  करती करवटें बदलती बहती सरिता

का आदर्श  रूप

हो गयी  अब  गए  दिनों  की  बात ,


स्वच्छ  जलधारा  का  मनभावन  संगीत

हो  गयी  अब  इतिहास  की  बात।


शहरीकरण  की आँधी  में

गंदगी  को  खपाने  का

एकमात्र  उपाय / साधन 

एक  बे-बस  नदी  ही  तो  है,

पर्यावरण  पर  आँसू  बहाने  के  लिए

सदाबहार  बहुचर्चित ज्वलंत मुद्दा  

हमारे  द्वारा  उत्पादित  गन्दगी  ही  तो  है।




Yamuna River At Etawah (Uttar Pradesh)


खुले  में  पड़ा  मल  हो

या


सीवर  लाइन  में  बहती  

हमारे द्वारा उत्पादित  गंदगी,

समाज  की  झाड़न  हो

या


बदबूदार  नालों  में  बहती  बजबजाती  गंदगी

सब पहुँचते  हैं  

एक  निर्मल  नदी  की  पवित्रता भंग  करने


जल  को  विषाक्त / प्रदूषित   बनाने।


नदी  के  किनारों  पर

समाज  का  अतिक्रमण,


है  कुंठित  मानवीय  चेष्टाओं  का  

भौतिक  प्रकटीकरण।

प्रपंच के  जाल  में  उलझा  मनुष्य

नदी  के  नाला  बनने  की  प्रक्रिया  को


 देख  रहा  है  लाचारी  से,

नदियों  के  सतत  सिमटने  का  दृश्य

फैलता  जा  रहा  है  पूरी  तैयारी  से।


नदी  के  किनारे  बैठकर

 कविता  रचने  की  उत्कंठा

जर्जर पंख फड़फड़ाकर दम तोड़  रही है,

बहाव  में  छिपी  ऊर्जा को 

मनचाहा रूप  देने के वास्ते 


नदी की धारा भौतिकता मोड़ रही है।


नदी से अब पवित्र विचारों का झौंका नहीं

नाक सिकोड़ने को विवश करता

सड़ांध का ग़ुबार  उठता  है,

हूक  उठती  है  ह्रदय  में

नदी  के  बिलखने  का 

करुण स्वर उभरता है।


नदी अपने  उदगम  पर  पवित्र  है


लेकिन......

आगे  का  मार्ग

गरिमा  को  ज़ार-ज़ार  करता है,


 बिन बुलाये मिलने आ रहा

गंदगी  का  अम्बार


गौरव  को  तार-तार  करता है।


नदी  चीख़ती  है 

कराहती  है

तड़पती है 

कहती  है -


"ज़हरीले रसायन, मल, मूत्र, मांस, मलबा...प्लास्टिक और राख

क्यों मिलाये जा रहे हैं मुझमें...?



मासूम  बचपन  जब  मचलता  है

नदी  में  नहाने  को / जलक्रीड़ा को 

देख  समझकर  मेरा  हाल


कहता  है  मुझे  गंदा  नाला


और  रोक  लेता  है  

अपनी  चंचलता  का  विस्तार

कोई  बताएगा  मुझे...!


आप, तुममें  से


किसी  मासूम  को  न  समझा  पाने  में 


मेरा  दोष  क्या  है ?


©रवीन्द्र  सिंह यादव



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