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बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

युद्ध और भूख

हम जानते हैं 

दुनिया में भूख का साम्राज्य 

युद्दों की देन है 

फिर भी कुछ खाए-पिए-अघाए 

युद्द कैसे हों 

इस रणनीति पर 

सोचते दिन-रैन हैं

पसरते पूँजी के पाँवों तले 

दब गई है चीत्कार भूखों की 

अब नहीं टोकती 

प्रबुद्ध मानवता 

युद्धोन्माद में डूबे दिमाग़ों को

विकृत सोच के हवाले  

छोड़ दिया है दुनिया को!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 20 जून 2021

पिता की स्मृति

 

6 फरवरी 2008 से 

अब तक 

एक अधूरापन 

मेरे भीतर 

घर कर गया है 

करते होंगे लोग 

बरसी पर स्मरण पिता को

मेरी स्मृति से 

वह पल जाता ही नहीं 

जब मुखाग्नि दी थी 

बड़े भैया ने चिता को

एक काया 

अपना सफ़र 

मुकम्मल कर रही थी   

देखते-देखते 

पिता जी की पार्थिव-देह 

पंचतत्त्व में विलीन हो गई थी

उन्हें लेकर गए थे 

सजी हुई उदास अर्थी पर  

शमशान-घाट

लौट आए थे 

उनकी स्मृतियों के साथ

बेबस बस ख़ाली हाथ

संस्कारों की फ़सल 

मूल्यों की अक्षय पूँजी

कुल के दायित्त्व

विश्वास का घनत्त्व  

इच्छाओं की गठरी 

बोध-कथाओं की लायब्रेरी

जीने की कलाओं का विस्तार 

देकर छोड़ गए हो संसार!  

आपकी स्मृति 

सघन परछाइयों में 

शून्य लिख जाती है

जिसके अर्थ तलाशता हुआ 

अपने पिता होने के 

अर्थ तलाशता हूँ

तस्वीर हो जाने के ख़याल में  

ख़ुद को खँगालता हूँ

नब्बे वर्ष की आयु 

निरोग जीवन जीकर

आपका महाप्रस्थान 

आपका साथी बूढ़ा नीम 

है अब मेरा मित्र महान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

किसको क्या मिला?


 तुच्छताओं को 

स्थाई स्थान ढूँढ़ना था 

तो राजनीति में समा गईं

हताशाओं को 

तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की 

तो कापुरुष में समा गईं

चतुराई चपला-सी चंचल 

भविष्य बनाने निकली 

तो बाज़ारों की रौनक में बस गई 

जीने की चाह 

भटकती रही 

सन्नाटोंभरे खंडहरों में 

लड़खड़ाकर गिरने से पहले 

सँभल गई

मानवता पूँजी के अत्याचार झेलते-झेलते 

क्षत-विक्षत होकर ख़ुद से आश्वस्त हुई 

तो विचार-क्रांति के साथ कोहरे को चीरती चली गई।

© रवीन्द्र सिंह यादव


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