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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

जेलों में जिस्म तो क़ैद रहे...

जेलों में 

जिस्म तो क़ैद रहे 

मगर जज़्बात 

आज़ाद रहे

महामूर्खों के 

दिमाग़ की उपज 

बेवक़ूफ़ कीड़े-मकौड़े 

खाए जा रहे

काँटों के बीच 

मनोमालिन्य से परे 

आशावान अंतरात्मा के 

पलते मीठे बेर  

चीख़-चीख़कर

अपने पकने की 

मौसमी ख़बर  

सैटेलाइट को ही 

बार-बार बता रहे

भूख का सवाल 

बड़ा पेचीदा है 

कंप्यूटर में घुसपैठ 

संगीन षडयंत्र के 

सबूत बता रहे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव




रविवार, 17 मई 2020

आपने देखा सड़कों पर तड़पता बिलखता आत्मनिर्भर भारत?



पत्थर हुआ जाता है

रोटी का कड़क कौर

जल के प्यासे होने का

आया है भयावह दौर

आत्मा को तलाश है 

मिले कहीं सुकून का ठौर

जहाँ स्वार्थ का हिसाब न बना हो सिरमौर  

एक अंतरध्वनि अब सोने नहीं देती

सड़कों पर तड़पते, बिलखते  

आत्मनिर्भर(?) भारत की तस्वीर...

श्रमजीवी लहू से लहूलुहान 

रेल पटरियाँ-सड़कें...

यह तो नहीं थी ख़्वाब की ताबीर...  

कचोटती है बस रोने नहीं देती 

कोविड-19 महामारी ने सिद्ध किया है कि 

समाज कितना आत्मकेन्द्रित हुआ है 

कितना संवेदनशील हुआ है 

कितना संवेदनाविहीन हुआ है 

जनहित के लिए बना शासन-प्रशासन 

कितना बेपरवाह,मूर्ख,निर्लज्ज और दुष्ट हुआ है

विज्ञान सहायक हुआ भी है 

तो बस समाज के 

अल्पसंख्यक कोने के लिए 

न बनाता हवाई जहाज़ / जलपोत 

तो करोना वायरस कैसे निकलता चीन से

खोजने होंगे अर्थ 

भविष्य के लिए कुछ समीचीन से 

इस बदलते दौर में 

महाशक्तियाँ किंकर्तव्यविमूढ़ हुईं 

क़ुदरत से राहत माँग रहीं हैं

अपनी विवशता की सीमाएँ लाँघ रहीं हैं 

जिन्हें अहंकार था सर्वेसर्वा होने का 

वे एक वायरस की चुनौती के समक्ष 

मजबूरन नत-मस्तक हुए हैं

दंभी,मक्कार, झूठे-फ़रेबी 

आज हमारे समक्ष बस मुए-से हैं।

©रवीन्द्र सिंह यादव


शब्दार्थ

सिरमौर = सिर + मौर अर्थात सर (शुद्ध रूप) का मौर (मौहर शुद्ध  रूप), सर का ताज, मुकुट /                                  CROWN  

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

रहते इंसान ज़मीर से मुब्तला



ये 
ऊँची 
मीनारें  
इमारतें 
बहुमंज़िला 
रहते इंसान 
ज़मीर से मुब्तला। 

वो 
बाढ़ 
क़हर 
न झोपड़ी 
न रही रोटी 
राहत फंड से 
कौन करेगा मौज. © रवीन्द्र सिंह यादव

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