तूफ़ान आएंगे,
सैलाब आएंगे,
उखाड़ेंगे,
उड़ा ले जायेंगे
उड़ा ले जायेंगे
उन्नत , उद्दंड दरख़्तों को।
दूब मुस्कायेगी,
अपनी लघुता / विनम्रता पर ,
पृथ्वी पर पड़े-पड़े पसरने पर।
छाँव न भी दे सके तो क्या,
घात-प्रतिघात की,
रेतीली पगडंडी पर,
घाम की तीव्र तपिश से,
तपे पीड़ा के पाँव,
मुझपर विश्राम पाएंगे,
दूब को दुलार से सहलायेंगे।
@रवीन्द्र सिंह यादव