मदारी
एक बार फिर
व्यस्त हैं सजाने में
अपना-अपना पिटारा
कोई सजा रहा है
भव्य भड़काऊ रथ
कोई झाड़ रहा है
अपनी गाड़ी ज़ंग खायी खटारा
पैने हो रहे हैं
सवालों के तीखे तीर
कोई दोहरायेगा
रटे जवाबों की
घिसी-पिटी लकीर
होगा कोई सॉफ्ट...
कोई एकदम हार्ड...
खेलेगा अभिनय करते
कोई विक्टिम कार्ड
दाल में हो कुछ काला
आस्तीन में साँप काला
है कोई पाला बदलने वाला
या फिर हो घोटाला गड़बड़झाला
कहीं डूबेगी नैया
कहीं खुलेगा क़िस्मत का ताला
अपराधियों-आरोपियों-लम्पटों का
लफ़्फ़ाज़ीमय रंगारंग शो
देख-देख ख़ुद को कोसेगी जनता
कॉरपोरेट-पार्टी-मीडिया
गठजोड़ को अब कौन नहीं जानता
बेरोज़गारों को मिलता
भरपूर मौसमी काम
नयी सरकार देती जनता को
तोहफ़ा बढ़ाकर चीज़ों के दाम
चुनावी हिंसा में
कुछ घरों के
चराग़ बुझाते हुए
गुज़र जायेगा
एक और चुनावी दौर
हम तलाशते रहेंगे
पुनः अपने-अपने
पाँवों के नीचे ठौर।
© रवीन्द्र सिंह यादव
ज़ंग = RUST