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शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

निरपराध

गुनगुनी अलसाई धूप में  

चील की कर्कश चीत्कार

सुन रहे हैं मासूम कान

विष वमन करते सर्पों को देख 

घर होता जा रहा है मकान  

कोमल मन पर घृणा के घाव देने 

खुल रही है दुकान-दर-दुकान

कैसे जीएगा नन्हा मेमना जीभर 

घेरे खड़ा है भेड़िया, चेहरे पर लिए कुटिल मुस्कान? 

© रवीन्द्र सिंह यादव   


मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

रंजिशों के साथ

सपनों की 

भव्य अट्टालिकाओं को 

ढह जाना होता है

नयनों में उमड़े 

दर्दीले आँसुओं को 

बस बह जाना होता है

उपवन के सौंदर्य में लवलीन

रसिक मन को 

काँटों का चुभना 

सह जाना होता है

चन्द्रिका बिखर जाती है 

अँधेरी राहों को 

रौशन करने 

तब 

जुगनुओं के दिल को 

रंजिशों के साथ 

कृष्णपक्ष तक 

चुप रह जाना होता है।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

    

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

बसंत तुम आ तो गये हो!
















बसंत तुम आ तो गये हो! 
लेकिन कहाँ है...
तुम्हारी सौम्य सुकुमारता ?
आओ!
देखो!
कैसे कोमल मन है हारता।

खेत, नदी, झरने, बर्फ़ीली पर्वत-मालाओं में 
फ़स्ल-ए-गुल के अनुपम नज़ारे, 
बुलबुल, कोयल, मयूर, टिटहरी 
टीसभरे बोलों से बसंतोत्सव को पुकारे। 

अमराइयों में नवोदित मंजरियों का
बसंती-बयार के साथ मोहक नृत्य,
मानव का सौंदर्यबोध से पलायन 
वर्चस्व-चेष्टा के अनेक आलोच्य-कृत्य। 

अभी गुज़र जाओ चुपचाप 
सन्नाटे में विलीन है पदचाप
बदलती परिभाषाओं की व्याख्या में 
अनवरत तल्लीन हैं बसंत-चितेरे। 
© रवीन्द्र सिंह यादव 
    

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

मन भर मन पर भार 

चल नहीं पाते उठाकर 

अब हम क़दम दो-चार 

पूर्वाग्रही सूचनाओं की 

आयी अजब  भरमार 

कहते फिर भी हम उसे 

निर्भीक  निष्पक्ष अख़बार 

ज़ेहनियत होती जाती बीमार 

समाया रग-रग में भ्रष्टाचार 

नैतिकता बेबस खड़ी उस पार

बदल गया है क़ायदा कारोबार

कहीं पौ-बारह कोई हुआ लाचार    

मन पर बढ़ता क्रोध का अम्बार 

परे होंगे त्रासद मनोविकार 

आओ छेड़ें सरगम के तार 

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

सुनो बच्चों की चुलबुली पुकार

भरेगा भावुक ह्रदय  में प्यार।

© रवीन्द्र सिंह यादव



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