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बुधवार, 29 मई 2024

नदी का स्वभाव

चित्र: महेन्द्र सिंह 

कल-कल करती 

निर्मल नदी को देखो

गतिमान है मुहाने की ओर 

सूरज की तपिश 

संलग्न है 

नदी की काया को 

छरहरा बनाने की ओर 

नदी आशांवित होती है 

पहुँचने मुहाने तक 

सागर में मिलने हेतु  

आगे मिल जाएँगीं 

समा जाएँगीं 

कुछ और छोटी-छोटी नदियाँ

उसकी जलराशि और सौंदर्य में इज़ाफ़ा करने  

नदी उनका 

तिरस्कार नहीं करती है 

आह्लादित होती है 

संगम और समंवय के साथ

मनुष्य,पशु-पक्षियों,पेड़-पौधों का 

सुकून में बदलता है 

प्यास का एहसास

देखकर बहती निर्मल नदी

लगे अंकुश मानवीय महत्वाकांक्षाओं  पर 

तो बहती रहे नदी 

अविरल,अविचल,अविकल,अनवरत 

सदी-दर-सदी कल-कल छल-छल।   

©रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

काल-चक्र

पराजयबोध लिए 

बैठा है मानव 

करोना-काल के 

दुष्कर दुर्दिन में 

भोर-बेला में 

शांत है नदी तट 

दोपहर में 

सन्नाटे को 

गले लगाए है 

वयोवृद्ध विशाल वट

विरह वेदना में 

विचलित है 

सिंदूरी संध्या 

झील में डूबता 

रक्ताभ सूरज 

तलाश रहा है 

विस्फारित नेत्रों से 

प्रकृति का 

कुशल चितेरा 

उदासियों का 

गठा गट्ठर लादे 

बीतेगी अपनी गति से 

अतल अवसाद की 

स्याह ओढ़नी ओढ़े 

झुँझलाई यामिनी

काल का कलन करता 

अभिमान को रौंदता

आएगा एक और सबेरा।

© रवीन्द्र सिंह यादव  

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