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शनिवार, 9 मई 2020

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव


जीवन के भयावह झंझावात से 

गुज़र रहे हैं हम 

उजाले धुँधले हुए जाते हैं 

छा रहा अनचीता तम ही तम

उन्हें देखो 

जो भयमुक्त होकर डट गए हैं 

सुरीला संगीत 

फूलोंभरा बिस्तर 

रिश्तों की डोर 

किताबोंभरी अलमारी

मुस्कुराती बांसुरी

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव    

परे रख 

आत्मप्रचार से परे 

करोना वायरस से लड़ने 

इस ज़मीं को बेहतर बनाने

अकेले कंधे पर हाथ रखने  

वक़्त की सलवटें मिटाने

जुट गए हैं 

दर्द की बूँदें बरसने के बाद 

इंद्रधनुषी आभा की आस में

जीवन के प्रति अनुराग के बीज  

बस्ती-बस्ती के प्रभामंडल में बोने।

© रवीन्द्र सिंह यादव  


शब्दार्थ     

झंझावात = आँधी, तूफ़ान, प्रचंड वेग से बहती वायु 

अनचीता = सहसा घटित होने वाला,अनचाहा  

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे



धीरे -  धीरे     ज़ख़्म       सारे

अब      भरने    को   आ   गए ,

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।



ज़िन्दगी     को     जब     ज़रूरत

उजियारे     दिन   की   आ    पड़ी,

लपलपायीं                 बिजलियाँ

गरजकर  काले  बादल  छा  गए। 

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल  है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




बाँसुरी      की    धुन    पे  थिरका

बृज   के    साथ    सारा   ज़माना,

श्याम   जब    राधा   से   मिलने

यमुना    तट   पर     आ      गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




आज     फिर   आँगन     में    मेरे

नन्हीं      कलियाँ      खिल     रहीं,

गीत     फिर     इनको     सुनाओ

जो     दादी    नाना     गा      गए।

एक   बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




क्या      मनाएं      जश्न       हम

ज़िन्दगी       की     जीत       का,

बाँटने     को    थीं    जो      चीज़ें

हम     उन्हीं     को     खा     गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा     गए।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस रचना  को सस्वर  सुनने के लिए  लिंक - https://youtu.be/QdAzRuiZa8

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