नाविक नैया खेते-खेते
तुम चले गए उस पार
बाट तुम्हारी हेरे-हेरे
थके नयन गए हार
बादल ठहरे होंगे कहीं
कहे क्षितिज की रेखा
संध्या का सफ़र शुरू होगा
हो न सकेगा अनदेखा
नदी शांत है आ जाओ
होगा मटमैला पानी
सांध्य-दीप साथ जलाना
होगी परिपूर्ण कहानी।
© रवीन्द्र सिंह यादव
