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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

पागल कहते हैं लोग

ज़माना 

बहुत बुरा है 

कहते हुए 

सुने जाते हैं लोग 

मझदार से निकालकर 

किनारे पर कश्ती डुबोना

ऐसा तो नहीं चाहते हैं लोग 

दरीचों के सीनों में 

दफ़्न हैं राज़ कितने 

आहिस्ता-आहिस्ता 

बताते हैं लोग 

दास्तान-ए-हसरत 

मुसाफ़िर कब सुनाते हैं 

गले लगाने से पहले 

आजमाते हैं लोग

बिजलियाँ अक्सर 

गिरती रहतीं हैं 

फिर भी आशियाना 

बनाते हैं लोग

वो माँगता फिर रहा है 

औरों के लिए दुआ 

न जाने क्यों उसे 

पागल कहते हैं लोग। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

 

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

कश्ती के मुसाफ़िर को

कश्ती के 

मुसाफ़िर को

साहिल की 

है दरकार

बिफरा समुंदर  

अपनी मर्यादा 

लाँघ जाता 

है कभी-कभार

सुदूर किनारे पर 

वो उदास पेड़ की 

शाख़ पर   

शोख़ हवा की 

है शबनमी लहकार 

है तसल्ली 

बस इतनी

अब तक 

साथ निभाती  

अपने हाथ 

है पतवार।   

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

समुंदरों को दिखा रहा हूँ


मैं अपनी  कश्ती  पार लाकर, 

समुंदरों   को  दिखा  रहा  हूँ। 


जीवन   के  ये  गीत  रचे जो, 

मज़लूमों   को  सुना  रहा हूँ। 


चला हूँ जब से कँटीले पथ पर, 

पाँव   के   छाले  छुपा  रहा हूँ। 


उतर  गया  हूँ  सागर तल में, 

प्यार  के  मोती  उठा  रहा हूँ। 


अहंकार    के    दावानल   में, 

प्रेम  की  बूँदें  गिरा  रहा   हूँ। 


जहाँ बुझ गया चाँद फ़लक का, 

चराग़  होना  सिखा  रहा  हूँ।   


इंसानियत    के    कारवाँ   में, 

जुड़ो  अभी   मैं  बुला  रहा  हूँ। 


उदास   बैठी   सूनी  घाटी  में, 

उम्मीद के फूल खिला रहा हूँ।  


अंधकार   से   डरना   छोड़ो, 

मैं  एक  दीपक  जला रहा  हूँ।  

© रवीन्द्र सिंह यादव


गुरुवार, 21 जून 2018

ख़लिश दिल की

रोते-रोते 
ख़त लिखा 
अश्क़ों का दरिया
बह गया 
हो गए  
अल्फ़ाज़ ग़ाएब 
बस कोरा काग़ज़
रह गया
अरमानों की 
नाज़ुक कश्ती में 
गीले जज़्बात रख  
दरिया-ए-अश्क़ में
बहा दिया 
हसरतों का 
आज भी 
अंतर में 
जल रहा दीया 
गलने से पहले 
मिल जाय गर 
सुन लेना 
सिसकती सदाएँ  
महसूसना 
तड़प-ओ-ख़लिश पुरअसर। 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

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