बुधवार, 29 मार्च 2023

कट रहे हैं दिन

ह्रदय का असहज स्पंदन 

फूलों की गमक-सा 

बिखर गया है

पहाड़ कटने का क्रूर संगीत सुन 

बदन सिहर गया है  

स्मृतियों के खुरदरे फ़र्श पर 

इतिहास का पन्ना खुल गया है

गुमनाम आँसुओं की धार से धुलकर 

निरंकुश सत्ता का मुखौटा 

ख़ौफ़नाक हो गया है

विधि-विधान की लगाम 

किसको सौंप दी हमने

लाचारी की चादर ओढ़ 

लोक सारा सो गया है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव   


विशिष्ट पोस्ट

सीढ़ी जो उदास थी...

                             चित्र साभार : गूगल  बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान  रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जा...