आम की फली हुईं
अमराइयों में
कोयल का कुहू-कुहू स्वर
आज भी
उतना ही
सुरीला सुनाई दे रहा है
मयूर भी
अपने नृत्य की
इंद्रधनुषी आभा से
मन को मंत्रमुग्ध करता
दिखाई दे रहा है
तितली-भंवरे
मधुवन में
अपने-अपने मंतव्य
ढूँढ़ रहे हैं
स्याह रात में
झींगुर-मेंढक के स्वर
गूँज रहे हैं
जुगनू भी
अँधेरे से लड़ते
नज़र आ रहे हैं
उल्लू-चमगादड़
मुस्तैद मिशन पर
रोज़ जा रहे हैं
रातरानी के सुमन
मदमाती सुगंध
बिखेर रहे हैं
मेंहदीं के झाड़
किसी की बाट हेर रहे हैं
अंबर के आनन में
मेघमालाएँ सज रहीं हैं
कलियाँ-फूल और पत्तियाँ
अपनी नियति के पथ पर
सहज सज-धज रहीं हैं
पहली बारिश में
नदी मटमैली होकर
अपने तटबंधों को
सचेत कर रही है
चंदा-सूरज की कालक्रम सूची
नियमित समय-पटल पर
टंग रही है
हवा भी राहत की सांस लेकर
मन रंग रही है
एक इंसान है
जो आशंकाओं से घिर गया है
करोना-वायरस के मकड़जाल में
फँस गया है
युवा-मन भविष्य की तस्वीर पर
असमंजस से भर गया है
अवसर की आस में
थककर आक्रोश से भर गया है
कोई अपनी पगडंडियाँ बनाकर
अनजान सफ़र पर चल पड़ा है
आत्मबल की पूँजी के सहारे
उतरना ही है अब मझदार में
कब तक चलेगा किनारे-किनारे?
© रवीन्द्र सिंह यादव
अमराइयों में
कोयल का कुहू-कुहू स्वर
आज भी
उतना ही
सुरीला सुनाई दे रहा है
मयूर भी
अपने नृत्य की
इंद्रधनुषी आभा से
मन को मंत्रमुग्ध करता
दिखाई दे रहा है
तितली-भंवरे
मधुवन में
अपने-अपने मंतव्य
ढूँढ़ रहे हैं
स्याह रात में
झींगुर-मेंढक के स्वर
गूँज रहे हैं
जुगनू भी
अँधेरे से लड़ते
नज़र आ रहे हैं
उल्लू-चमगादड़
मुस्तैद मिशन पर
रोज़ जा रहे हैं
रातरानी के सुमन
मदमाती सुगंध
बिखेर रहे हैं
मेंहदीं के झाड़
किसी की बाट हेर रहे हैं
अंबर के आनन में
मेघमालाएँ सज रहीं हैं
कलियाँ-फूल और पत्तियाँ
अपनी नियति के पथ पर
सहज सज-धज रहीं हैं
पहली बारिश में
नदी मटमैली होकर
अपने तटबंधों को
सचेत कर रही है
चंदा-सूरज की कालक्रम सूची
नियमित समय-पटल पर
टंग रही है
हवा भी राहत की सांस लेकर
मन रंग रही है
एक इंसान है
जो आशंकाओं से घिर गया है
करोना-वायरस के मकड़जाल में
फँस गया है
युवा-मन भविष्य की तस्वीर पर
असमंजस से भर गया है
अवसर की आस में
थककर आक्रोश से भर गया है
कोई अपनी पगडंडियाँ बनाकर
अनजान सफ़र पर चल पड़ा है
आत्मबल की पूँजी के सहारे
उतरना ही है अब मझदार में
कब तक चलेगा किनारे-किनारे?
© रवीन्द्र सिंह यादव