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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

जेलों में जिस्म तो क़ैद रहे...

जेलों में 

जिस्म तो क़ैद रहे 

मगर जज़्बात 

आज़ाद रहे

महामूर्खों के 

दिमाग़ की उपज 

बेवक़ूफ़ कीड़े-मकौड़े 

खाए जा रहे

काँटों के बीच 

मनोमालिन्य से परे 

आशावान अंतरात्मा के 

पलते मीठे बेर  

चीख़-चीख़कर

अपने पकने की 

मौसमी ख़बर  

सैटेलाइट को ही 

बार-बार बता रहे

भूख का सवाल 

बड़ा पेचीदा है 

कंप्यूटर में घुसपैठ 

संगीन षडयंत्र के 

सबूत बता रहे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव




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