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शनिवार, 16 मई 2026

कॉकरोच और परजीवी


जिसके मन-मस्तिष्क पटल पर,

घनीभूत घनघोर घृणा का डेरा है,

सजग नागरिक के प्रति जिसके उर में,

संवेदना और भावों का अंधेरा है,

कुंठा और खिन्नता का,

जिसमें आकंठ बसेरा है.

कैसे वह संविधान-संरक्षक होने का अधिकारी है?


हिलाकर चूलें शासन और प्रशासन की,

बहाकर ख़ून-पसीना पारदर्शिता जो लाते हैं,

उन प्रबुद्ध कर्मठ कार्यकर्ताओं को,

जो 'कॉकरोच-परजीवी' बतलाते हैं,

लोकतंत्र के सजग सक्रिय प्रहरियों को,

यह अपमान अन्याय सर्वथा भारी है!


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,

या हो सूचना का अधिकार,

संविधान ने हमको सौंपे,

ये पावन अनुपम उपहार।


किसी व्यक्ति विशेष की कृपा नहीं,

ये संविधान की अनुकम्पा है,

ये अधिकार किसी की जागीर नहीं,

यह तो जन-जन की कमाई है!

लोकतंत्र की इस बगिया में

सबकी साझी अरुणाई है।

©रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

अमरबेल (वर्ण पिरामिड )



मैं 
रहूँ 
सदैव 
हरी-भरी 
पैरासूट-सी 
आच्छादित होती 
मेज़बान    पेड़     पे।  



मैं 
तो हूँ 
घोषित 
परजीवी 
आतिथेय से  
हासिल पोषण 
झेलूँ  दोषारोपण।



जो 
होता 
मुझमें 
क्लोरोफिल 
स्वाभिमान से
सजती-खिलती   
जीती   अमरबेल। 

© रवीन्द्र सिंह यादव
























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