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शुक्रवार, 1 मई 2020

अज्ञात सफ़र

सफ़ेद कबूतर उड़ा साहिल से 

समुद्र में डूबते सूरज को देखने 

उड़ता गया... उड़ता ही गया!

अब समंदर के ऊपर था 

बस अँधेरा...घना अँधेरा!

रेत न पीछे नज़र आया 

न बहुत आगे तक...  

सफ़ेद कबूतर ने 

लौटने का निश्चय किया

जहाँ से उड़ा था 

उस ओर मुड़ा था 

थक-हारकर 

साहिल पर आ गिरा था 

ज्वार आया तो 

सुरक्षित ज़मीन पा गया था

सांसें सामान्य हुईं 

प्राची में लालिमा देख 

नवजीवन पाकर 

जिजीविषा के साथ 

उड़ गया ज्ञात परिवेश में 

अज्ञात सफ़र के अनुभव सुनाने।  

©रवीन्द्र सिंह यादव   

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

उठ खड़ी होती है जिजीविषा


नाव डगमग डोली 

तो 

माँझी पर 

टिक गयीं 

आशंकित आशान्वित आँखें, 

कोहरा खा गया 

दिन का भी उजाला 

अनुरक्त हो भँवरे की 

प्रतीक्षा कर रहीं सुमन पाँखें। 


सड़क-पुल के टेंडर 

अभी बाक़ी हैं 

कुछ अनजाने इलाक़ों में 

बहती नदियों और पगडंडियों के, 

अपने आदमी को 

मिले सरकारी सौग़ात 

इस तरह भँवर में 

अनवरत घूमते सोपान प्रगति के।   


विकल है आज तो बेकल मन 

परिवेश में गूँजता 

चीत्कार का व्याकुल स्वर,

प्रभा-मंडल में यह कैसा नक़ली आलोक 

नीरव निशा की गोद में 

तनिक विश्राम करके 

उठ खड़ी होती है जिजीविषा 

अनायास सिहरन का उन्मोचन कर।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

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जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...