तुम्हारे प्यार का
रंगीन
महल
मुकम्मल होने से पहले
क्यों ढहता है
बार-बार
भरभराकर
शायद तुमने
चालूपने की
ख़स्ता-हाल
ईंटें चुनी है
प्यार को
रुस्वा किया है
जज़्बात का
नक़ली सीमेंट लगाकर।
© रवीन्द्र सिंह यादव