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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

प्यार का महल (क्षणिका)



तुम्हारे प्यार का 

रंगीन महल 

मुकम्मल  होने से पहले 

क्यों ढहता है 

बार-बार 

भरभराकर 

शायद तुमने 

चालूपने की 

ख़स्ता-हाल 

ईंटें  चुनी है   

प्यार को 

रुस्वा किया है 

जज़्बात का 

नक़ली सीमेंट लगाकर।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

सोमवार, 20 अगस्त 2018

दीमक



हमारे हिस्से में 
जो लिखा था 
सफ़हा-सफ़हा से 
वे हर्फ़-हर्फ़ सारे 
दीमक चाट गयी
डगमगाया है 
काग़ज़ से 
विश्वास हमारा 
पत्थर पर लिखेंगे 
इबारत नई  
सिकुड़ती जा रही 
सब्र की गुँजाइश 
बिखरने के 
अनचाहे सिलसिले हैं 
इंसाफ़ की आवाज़ 
कहाँ गुम है ?
किसने आज़ाद हवा के 
लब सिले हैं?

© रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
सफ़हा = पृष्ठ,पन्ना / PAGE 
हर्फ़ = शब्द / WORD 
लब = होंठ / LIP(S)  



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