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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

धूप (वर्ण पिरामिड )




ये 
धूप 
जागीर  
है सूर्य की  
तरसाती है 
महानगर में 
बेबस इंसान को। 







लो 
आयी 
रवीना 
चीरकर 
घना कुहाँसा 
एहसास लायी 
मख़मली धूप-सा। 



आ 
गयी 
सर्दी भी 
मख़मली 
धूप लेकर 
कुहाँसा छा रहा 
दृश्य अदृश्य होने। 



वो 
देखो 
सेकती 
गुनगुनी 
धूप छज्जे पे 
अख़बार लिये 
चाय पीती दादी माँ।  
 © रवीन्द्र सिंह यादव




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