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सोमवार, 4 जुलाई 2022

गुलमेहंदी,जूही और गेंदा

नीले फूलों लदी  

गर्वीली गुलमेहंदी  

की 

मोहक मुस्कान 

मानसिक थकान को 

सोख न सकी 

तब 

तिरस्कार की चुभन 

तीव्र करती  

श्वेत सुमन के साथ 

इतराने लगी जूही

अंततः 

केसरिया पुष्प धारण किए 

आत्मविस्मृत 

एकाकीपन में गुम गेंदे ने 

उपेक्षा की दहलीज़ पर 

स्वयं को समर्पित किया 

क्षितिज पर दृष्टि गढ़ाए 

कोई बढ़ गया आगे 

कोमल फूलों को कुचलता हुआ!

किसी ने देखा... 

मासूम महकता फूल 

अनिच्छा से मिट्टी में मिलता हुआ?

© रवीन्द्र सिंह यादव  

   

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

विरह वेदना

 नाविक नैया खेते-खेते 

तुम चले गए उस पार 

बाट तुम्हारी हेरे-हेरे 

थके नयन गए हार

बादल ठहरे होंगे कहीं 

कहे क्षितिज की रेखा 

संध्या का सफ़र शुरू होगा 

हो न सकेगा अनदेखा

नदी शांत है आ जाओ 

होगा मटमैला पानी

सांध्य-दीप साथ जलाना 

होगी परिपूर्ण कहानी। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 17 नवंबर 2018

चिड़िया और इंसान



चिड़िया और इंसान

हैं सदियों पुराने मित्र,

सभ्यता के सफ़र में

चिड़िया वही इंसान विचित्र।


छोटी-सी ज़िंदगानी में

चिड़िया अपने बच्चों को

सिखाती है ढेरों उपाय

बाज़, उल्लू, बिल्ली, साँप-से

शिकारियों से बचाव।


दूर क्षितिज तक उड़ना

पानी-धूल में नहाना

दाना चुगना 

नीड़ का निर्माण करना   

फुदकना चहचहाना 

साँझ-सकारे सामूहिक गान

सामूहिकता में सौहार्द सहमति 

समृद्धि हेतु क़ाएम रखना।


इंसान अपने बच्चों को

जीवनभर सिखाता है

जीने की गूढ़ कला,

फिर भी अब तक

इंसानी-समाज  

मन-मुआफ़िक़ क्यों नहीं ढला?
   
© रवीन्द्र सिंह यादव

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...