
जब
वातावरण में
समाहित वाष्प को
सिकोड़ देती है सतह की ठंडक,
तब
शबनम के दाने / ओस के मोती,
फूल-पत्तियों पर आसन जमाते हैं,
हमारे मरने-मिटने के भय को लजाते हैं।
मुनिया समझदार हुई,
पाँच बसंत पार हुई,
बोली एक इतवार को-
"पार्क में मैं भी चलूँगी,
कुलाँचें मैं भी भरूँगी...!"
सवालों-जवाबों के बीच पहुँचे पार्क,
चमका रही थीं ओस-कणों को,
भोर की मनहर रवीना,
ये क़ुदरत के आँसू हैं या पसीना...?
कवितामयी / छोटे मुँह बड़ी बात...!
सीधा मन-मस्तिष्क पर लुभावना आघात।
मैंने कहा-
यह ओस है,
उसने कहा-
"ENGLISH में बताओ"
"DEW...!" -जवाब मैंने दिया,
इसे तो मेरे टीचर ने वीडियो में दिखाया था...
सुनकर मेरे सपनों पर ओस पड़ गयी!
घर आते-आते सारी ओस झड़ गयी!!



