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रविवार, 3 फ़रवरी 2019

स्टोन क्रशर


पथरीले हठीले 

हरियाली से सजे पहाड़ 

ग़ाएब हो रहे हैं,

बसुंधरा के श्रृंगार  

खंडित हो रहे हैं। 


एक अवसरवादी 

सर्वे के परिणाम पढ़कर 

जानकारों से मशवरा ले, 

स्टोन क्रशर ख़रीदकर 

एक दल में शामिल हो गया। 


चँदा भरपूर दिया 

संयोगवश / धाँधली करके 

हवा का रुख़ 

सुविधानुसार हुआ, 

पत्थर खदान का ठेका मिला 

कारोबार में बरकत हुई,  

कुछ और स्टोन क्रशर की 

आमद हुई।  


खदान पर कार्यरत मज़दूर 

घिरे हैं गर्द-ओ-ग़ुबार से 

पत्थरों को तोड़कर, 

बनती पृथक-पृथक आकार की

बेडौल गर्वीली गिट्टी,

पत्थर होते खंड-खंड 

महीन से महीनतर, 

फिर महीनतम होती

चूरा-चूरा गिट्टी,

मज़दूरों की साँसों के रास्ते 

फेफड़ों में जमा हो रही है, 

और दौलत!

तथाकथित नेता की 

तिजोरियों में!


अगले चुनाव तक 

ठेकेदार नेता हो जायेगा 

और मज़दूर

भगवान को प्यारा हो जायेगा!

© रवीन्द्र सिंह यादव


शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

रेल-हादसा (वर्ण पिरामिड)



1. 

था 

क्रूर 

हादसा 

दशहरा 

अमृतसर 

रेल-रावण को 

दोष मढ़ते हम। 


2. 

ये

नेता  

मौत में 

तलाशते 

अपनी जीत 

संवेदना लुप्त 

दोषारोपण जारी। 


3. 

वे 

लेते 

वेतन 

सरकारी 

हैं अधिकारी 

ओढ़ते लाचारी 

क्यों जनता बेचारी? 



4. 

थी 

एक 

जिज्ञासा 

रावण को 

देखें जलता 

वीडियो बनाते 

क्षत-विक्षत हुए। 


5. 

है 

छाया 

मातम 

शहर में 

चीख़-पुकार 

  मौन है मंज़र 

हुए यतीम बच्चे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

दो क्षणिकाऐं

                                                                             
1.

जनता कहती 

सता रही है 

महँगाई की मार

नेताओं को 

पहनाओ अब 

सूखे पत्तों के हार। 

लेने वोट हमारा 

नेता 

झुकते बारम्बार

जीत गये तो 

इनका सजता  

सुरक्षित शाही दरबार।  




2. 


इबादत-गाहों में 

रहते कैसे-कैसे 

परमेश्वर के 

सेवादार

शराफ़त का हैं 

ओढ़े लबादा 

 पतित अधर्मी 

धर्म के ठेकेदार। 
  
© रवीन्द्र सिंह यादव



सोमवार, 21 अगस्त 2017

गुरु


डॉक्टर  को


उसके  गुरु


सिखाया  करते  थे-


"मौत से घृणा करो"


वे  आज


विश्वास के क़ातिल /


मौत के


सौदाग़र हो गए


पैसे के भारी


तलबग़ार हो गए।





नेता   को


उसके    गुरु


सिखाया करते थे-

"राजनीति का ध्येय

समाज-कल्याण है

उसूलों पर खरे उतरना "

वे आज

लाशों पर

रोटियां सेकने में

माहिर हो गए

भ्रष्टाचारी / अवसरवादी  दुनिया के 

मुसाफ़िर  हो  गए।





शिक्षक  को



उसके गुरु


सिखाया करते थे-


"चरित्र-निर्माण ही


राष्ट्र-निर्माण है"


वे  आज 


वैचारिक दरिद्रता के


क़ायल   हो  गए


अपनी ही शिक्षा के


तीरों से घायल हो गए ।





संत को 

उसके गुरु 

सिखाया करते थे -

"मोह माया से दूर रहो 


आध्यात्मिक ज्ञान से 


समाज-सुधार करो"


वे आज 


बड़े व्यापारी हो गए 

भोली जनता की 

गाढ़ी कमाई खाकर 


समाज पर 


बोझ भारी हो गए। 




कलाकार को 

उसके गुरु ने 

यह कहते हुए तराशा -

"कला का मक़सद 

सामजिक-चेतना को 

उभारना है

दरबारी कृपामंडल में 

चमकना नहीं 

रूह को वीरान 

होने देना नहीं

जितना तपोगे 

उतना निखरोगे "

वे आज 

भोगवादी विचार के  

शिकार हो 

विलासता में सिमट गये 

सरकारी ओहदे /अवार्ड / अनुदान की 

परिधि में 

कलात्मक -विद्रोह से 

महरूम हो 

सत्ता के हाथों 

लुट-पिट गये।  




नैतिक पतन के दौर में


हम अपनी ग़लतियों 

के  लिए  

प्रायश्चित नहीं करते 

न ही कभी

अपने भीतर झाँकते

परिणाम सामने हैं

दोषारोपण के और कितने

मील  के पत्थर गाढ़ने हैं ?

सामाजिक मूल्य गहरी नींद सो गए. ......!

गुरु क्यों अब अप्रासंगिक हो गए ?

#रवीन्द्र सिंह यादव


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