जेलों में
जिस्म तो क़ैद रहे
मगर जज़्बात
आज़ाद रहे
महामूर्खों के
दिमाग़ की उपज
बेवक़ूफ़ कीड़े-मकौड़े
खाए जा रहे
काँटों के बीच
मनोमालिन्य से परे
आशावान अंतरात्मा के
पलते मीठे बेर
चीख़-चीख़कर
अपने पकने की
मौसमी ख़बर
सैटेलाइट को ही
बार-बार बता रहे
भूख का सवाल
बड़ा पेचीदा है
कंप्यूटर में घुसपैठ
संगीन षडयंत्र के
सबूत बता रहे।
© रवीन्द्र सिंह यादव


