करोना काल के
विवश साक्षी हैं हम,
ऐतिहासिक तारीख़ के साथ
याद किए जाने के
महत्त्वाकाँक्षी हैं हम।
दर्ज हो रहे हैं
क़िस्से-दर-क़िस्से
मानवता के विस्तार
और संवेदनाविहीन व्यवहार के
समय की स्लेट पर
लिखी जा रही है इबारत,
पूँजी के आसपास
टिकी है
सरकारी
ग़ैर-सरकारी सोच
खिड़कियाँ बनाना
भूल गए हैं हम
खड़ी कर दी है
भावशून्य इमारत
जिसमें सब दिखेंगे
हाथ धोते हुए,
चेहरे पर मास्क का
अनचाहा भार ढोते हुए।
जिसके पृथक-पृथक तल में
अपने-अपने कंधों पर
लिए खड़े हैं हम अपनी लाशें,
विद्वता को नकार
भीड़ में मुँह छिपाकर
हम गिन रहे हैं
अपनी बची-खुचीं सांसें।
© रवीन्द्र सिंह यादव
विवश साक्षी हैं हम,
ऐतिहासिक तारीख़ के साथ
याद किए जाने के
महत्त्वाकाँक्षी हैं हम।
दर्ज हो रहे हैं
क़िस्से-दर-क़िस्से
मानवता के विस्तार
और संवेदनाविहीन व्यवहार के
समय की स्लेट पर
लिखी जा रही है इबारत,
पूँजी के आसपास
टिकी है
सरकारी
ग़ैर-सरकारी सोच
खिड़कियाँ बनाना
भूल गए हैं हम
खड़ी कर दी है
भावशून्य इमारत
जिसमें सब दिखेंगे
हाथ धोते हुए,
चेहरे पर मास्क का
अनचाहा भार ढोते हुए।
जिसके पृथक-पृथक तल में
अपने-अपने कंधों पर
लिए खड़े हैं हम अपनी लाशें,
विद्वता को नकार
भीड़ में मुँह छिपाकर
हम गिन रहे हैं
अपनी बची-खुचीं सांसें।
© रवीन्द्र सिंह यादव