जब देखता हूँ
तब स्वतंत्रता का
अनायास
स्मरण हो आता है
जब चाहे
उड़ सकती है
जहाँ चाहे जा सकती है
जब चाहे धूल में
नृत्य कर सकती है
अथवा पानी में
नहा सकती है
मनचाहा गीत
गा सकती
मुक्ताकाश में
विचरण कर सकती है
फिर सोचता हूँ
वह भी कहाँ स्वतंत्र है
उत्तरदायित्वों के बंधन
उस पर लदे हुए हैं
उससे शक्तिशाली
उसकी स्वतंत्रता
हनन करने पर
अड़े हुए हैं
घोंसले में
लौटने की
पाबंदी है
सोचिए
वह स्वतंत्र है
या बंदी है?
घोंसला बनाने
अंडे सेने
चुग्गा लाने की
दौड़ जीतना
चूजों को
सक्षम बनाने
दुनिया की ऊँच-नीच से
सतर्क करना
अपनी संतति में
जीवन के प्रति
अनुराग भरना
अस्तित्त्व बनाए रखने के लिए
पर्यावरण अनुकूल बनना
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की
परिभाषा गढ़ना
कलरव के लिए
बस सुबह की वेला चुनना
आत्मकेन्द्रित बंधनों में
जकड़े रहना
फिर कैसे कहे चिड़िया
कि वह स्व के तंत्र में
स्वतंत्र है या परतंत्र?
समाज या सरकार को
जो रास आए
बस वही लिखना और बोलना
अभी बाक़ी है
स्वाधीनता को सच्चे अर्थों में तोलना
क्रांति का गीत
दिमाग़ों में घुमड़ रहा है
कभी गूँजेगा पुरज़ोर
आज़ादी की फ़ज़ा में
बिखरेगी ख़ुशबू
उन फूलों से
खिल सकेंगे जो
वक़्त की रज़ा में!
बिखरेगी ख़ुशबू
उन फूलों से
खिल सकेंगे जो
वक़्त की रज़ा में!
© रवीन्द्र सिंह यादव
