अमन का गीत
मेरा खो गया है
देश का युवा चेहरा
पर कटे पंछी-सा
गर्दिश में खो गया है
वो फ़ाख़्ता
जो गुलिस्तां में
ग़म-ख़ोर गीत गाती है
उसका गला
अब तो रुँध-रुँधकर
थर्राकर भर्रा गया है
वो चित्रकार
रंग, कूची; कल्पना के साथ
बस बेबस खड़ा है
हालात के नारों को
सुन-सुनकर घबरा गया है
वाणी पर नियंत्रण
क़लम पर पाबंदी
मतभिन्नता की आज़ादी
अभिव्यक्ति के आयाम
सत्ता से तीखे सवाल पर
लेखक का वजूद चरमरा गया
गाँधी की हत्या से
सब्र नहीं जिन्हें
वे अब रोज़-रोज़
चरित्रहत्या कर रहे हैं
यह कौन है
जो शांत माहौल में
उकसावे का परचम लहरा गया?
© रवीन्द्र सिंह यादव